झांसी। इस साल नौ लोगों ने नसबंदी फेल होने का दावा किया है। स्वास्थ्य विभाग ने इन सभी की जांच कर अपनी रिपोर्ट शासन को भेज दी है। अब शासन स्तर पर गठित पैनल मामले की जांच करेगा। रिपोर्ट के आधार पर ही लाभार्थी को मुआवजा मिलेगा।
महिला और पुरुष नसबंदी दोनों में ही ऑपरेशन के दौरान जिस नस को काटा जाता है, उसके दोनों सिरों को धागा से अलग-अलग करके बांध दिया जाता है। आपरेशन के बाद यदि धागा ढीला पड़ जाए या उसकी गांठ खुल जाए तो ऐसी स्थिति में नसबंदी फेल हो जाती है। यदि कटी नसों के सिरे आपस में संपर्क में आएं तो वह स्वत: जुड़ जाते हैं। ऐसे में नसबंदी फेल हो जाती है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक इस साल नौ लोगों ने नसबंदी फेल होने का दावा किया है। नोडल अधिकारी डॉ. एनके जैन ने बताया कि उनके दावों की जांच कर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट शासन को भेज दी है। अब शासन स्तर पर गठित पैनल मामले देखेगा। इसके बाद ही उन्हें मुआवजा मिलेगा।
ऐसे मिलता है क्लेम
नसबंदी का आपरेशन होने के बाद यदि महिला के पेट में गर्भ धारण हो जाए तो उसे 90 दिन में क्लेम करना होता है। इससे पहले उसे अल्ट्रासाउंड भी कराना पड़ता है। यदि आवेदक ने अल्ट्रासाउंड नहीं कराया है तो ऐसी स्थिति में विभाग अल्ट्रासाउंड कराएगा। महत्वपूर्ण बात ये है कि जिस अस्पताल में उसने नसबंदी कराई है, वहीं उसे क्लेम का आवेदन करना होगा। साक्ष्य के तौर पर अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट जमा करनी होगी।