‘भक्ति’ से हो ‘शक्ति’ की आराधना
झांसी। भक्ति और संगीत का हमेशा से ही नाता रहा है, फिर चाहे वो मंदिरों में बजने वाले घंटे - घड़ियाल की करतल ध्वनि हो या भजन - आरती की सुमधुर स्वर लहरियां। लेकिन, इस परंपरागत रिश्ते का स्वरूप अब गलत राह पकड़ गया है, जिसमें फिल्मी गीतों की धुनों पर बने भजन सुनाई देते हैं, तो मौलिक भजन भी कर्कश आवाज और भारी भरकम संगीत के बीच गाए जाते हैं। लाउडस्पीकर की आवाज कानफोड़ू होती है। इन परिस्थितियों में शांत चित्त से दो मिनट ईश्वर का स्मरण करना भी संभव नहीं हो पाता है। रविवार को नवरात्र की शुरुआत के साथ ही शहर में जगह-जगह से ऐसी ही आवाजें सुनने को मिल रही हैं। हालांकि, सभ्य समाज को ये नागवार गुजरता है, लेकिन मामला धर्म का होने की वजह वे भी चुप्पी साधे रहते हैं।
रविवार को नवरात्र के प्रारंभ होने के साथ शहर में लगभग दो सौ स्थानों पर सार्वजनिक दुर्गा उत्सवों की शुरुआत हो गई है। सुबह से ही पंडालों में देवी प्रतिमाओं की स्थापना का क्रम चालू है। इसके साथ ही शहर में देवी भजनों की गूंज सुनाई देने लगी है। कई पंडालों पर तेज आवाज में लाउडस्पीकर बजाए जा रहे हैं। इनमें फिल्मी गीतों की धुनों पर बने भजन सुनने को मिल रहे हैं। इन भजनों के बोल कानों में जाने पर देव स्मरण बाद में होता है, पहले मूल फिल्मी गीत की याद आ जाती है। ऐसे में भक्ति का भाव रसातल में चला जाता है। इसके साथ ही इन दिनों कई भजन ऐसे में भी सुनने को मिल रहे हैं, जिनमें भारी भरकम संगीत होता है और गायक की आवाज भी कर्कश सी ही जान पड़ती है। इन भजनों को सुनने पर ऐसा लगता है कि मानो ये गाए नहीं, बल्कि थोपे जा रहे हैं। कई भक्त ऐसे भी हैं, जो सीधे तौर पर फिल्मी गीत बजाने से गुरेज नहीं करते। यहां तक कि वे अश्लील गीत भी बगैर किसी लिहाज के बजा उठते हैं।
हालांकि, सभ्य समाज में इसे ठीक नहीं समझा जाता है। लोगों का कहना है कि संगीत और देव आराधना का गहरा नाता है। घंटे - घड़ियालों की ध्वनि और आरती - भजन की धुन संगीत ही है। देश की संस्कृति में देव आराधना के लिए भजनों की कमी नहीं है। लयबद्ध होकर गाई जाने वालीं रामचरित मानस की चौपाइयां किसी का भी ध्यान स्वत: देवता की ओर मोड़ देती हैं।
नवरात्र से पहले सभी दुर्गा उत्सव समितियों की बैठक बुलाई गई थी, जिसमें तय हुआ था कि कोई भी न तो फिल्मी गाने बजाएगा और न ही फिल्मी गानों की धुन पर बने भजन। त्योहार पूरी शुचिता के साथ मनाया जाएगा। यदि कोई ऐसा करता है, तो गलत है।
- महंत विष्णु दत्त स्वामी, जिला धर्माचार्य
किसी भी फिल्मी गीत पर बने भजन को सुनकर सबसे पहले मूल गीत याद आता है। इससे भक्ति भाव को क्षति पहुंचती है। धार्मिक स्थल पर फिल्मी धुनों पर बने गीत बजाना या तेज आवाज में भजन बजाना, प्रदूषण फैलाना है। जबकि, धर्मिक स्थल पर हर तरह की स्वच्छता सर्वोपरि होनी चाहिए।
- पं. मनोज थापक, ज्योतिषाचार्य
गीत-संगीत ऐसा हो, जिससे धार्मिक वातावरण को बढ़ावा मिले। गानों की धुन पर बनाए जाने वाले भजन भद्दे लगते हैं। सही मायने में इन्हें भजन कहना ही नहीं चाहिए। साथ ही किसी भी धार्मिक स्थल पर शोरगुल नहीं होना चाहिए। देश के जितने भी बढ़े धार्मिक स्थल हैं, वहां शांति रहती है।
- संजय अग्रवाल, अध्यक्ष अग्रवाल समिति सदर बाजार
फूहड़ता को तो वैसे कहीं भी स्थान नहीं मिलना चाहिए। खासतौर पर धर्म के मामले में इससे पूरी तरह से परहेज करना चाहिए। गीत संगीत ऐसा हो, जिससे भक्ति का भाव बढ़े। इसके अलावा विसर्जन के दौरान भी कानफोड़ू संगीत नहीं बजना चाहिए।
- अर्जुन, व्यापारी
बेहतर हो कि दुर्गा उत्सव पंडालोें में भक्त ही अपने पुराने पारंपरिक भजन गाएं। इससे लाभ होगा। लोग भजन सीखेंगे भी। वरना स्थिति ये है कि तमाम लोगों को तो अब आरती तक याद नहीं है। जब वातावरण शांत होगा, तो चित्त भक्ति में लगेगा।
- मनोज अग्रवाल, सूर्यपुरम कॉलोनी
लोगों में भक्ति का भाव रहता है। लेकिन, अज्ञानता में वे फिल्मी धुनों पर बने भजन बजाते हैं। जबकि, इससे मौल बिगड़ता ही है। बेहतर हो कि दुर्गा उत्सव कमेटियों के लोग खुद भजन सीखें और नवरात्र के दौरान गाएं। इससे बच्चों में भी ये विचार विकसित होंगे।
- वंदना अग्रवाल, केके पुरी कॉलोनी
दुर्गा उत्सव के दौरान हमारी कमेटी हमेशा से ही पुराने धार्मिक भजन बजाती है। लेकिन, अन्य जगहों पर जरूर फिल्मी गानों की धुन पर भजन सुनने को मिलते हैं। ये ठीक नहीं है। इससे खासतौर पर बच्चों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। वे सुनने के बाद इन्हें दोहराते हैं। ऐसे गीत नहीं बजाये जाना चाहिए।
- जुगल किशोर अग्रवाल, सुभाष गंज दुर्गा उत्सव समिति
इस तरह के भजन बनने ही नहीं चाहिए। ये धार्मिक माहौल खराब करने का काम करते हैं। जबकि, संगीत ऐसा होना चाहिए, जिससे मंदिर या पंडाल में आने वाले लोगों का भक्ति भाव बढ़े। धर्म का मामला हो या रीति रिवाज संस्कृति का, किसी भी दशा में समझौता नहीं होना चाहिए।
- शिवकुमार रायकवार, फूटा चौपड़ा दुर्गा उत्सव समिति
हमारी कमेटी अनूप जलोटा जैसे भजन गायकों के गीत बजाती है, वो भी सीमित आवाज और सीमित ध्वनि में। नवरात्र के दौरान एक दिन माता का जागरण करते हैं। भक्तों को शांत माहौल में आराधना करने का अवसर देने का पूरा प्रयास करते हैं। अन्य लोगों को भी ये करना चाहिए।
- ऋषि बिंदल, शहीद पार्क दुर्गा उत्सव समिति
फिल्मी धुनों पर भजन का चलन है। जो भी गाना हिट हुआ, उसका भजन बाजार में आ जाता है। हम भी बजाते हैं। लेकिन, आगे से ऐसे भजन न बजाने का प्रयास करेंगे। साथ ही सरकार को भी इस पर रोक लगानी चाहिए। ऐसे भजन बनने ही नहीं चाहिए।
- नीलेश कुमार, सदर बाजार दुर्गा उत्सव समिति