मानसून लगातार दूसरी साल दगाबाजी पर उतारू है। बीते वर्ष भी जिले में मानक से कम बारिश हुई थी, जिसके चलते शासन ने जनपद को सूखाग्रस्त घोषित किया था। इस साल भी अभी से ही सूखे की संभावनाएं जताई जाने लगी हैं।
बुंदेलखंड में पानी का हमेशा से ही संकट रहा है। आजादी के छह दशक बाद भी सरकार खेतों की प्यास नहीं बुझा पाई है। ऐसे में किसान पूरी तरह से कुदरत पर निर्भर है। लेकिन, प्रकृति भी यहां के अन्नदाताओं की बार - बार परीक्षा लेती है। इसका अंदाजा पिछले पांच सालों के बारिश के आंकड़ों को देखकर आसानी से लगाया जा सकता है। जिले में बारिश का मानक आंकड़ा 879.10 मिमी है। लेकिन, बीते पांच सालों में केवल दो बार ही मानसून मानक को छू पाया है। 2011 में 899.62 मिमी तथा 2013 में मानक से कहीं अधिक 1288.88 मिमी बारिश हुई थी। जबकि, 2010 में मानक से कम 595.92 मिमी व 2012 में 726.44 मिमी बारिश हुई थी।
बीते वर्ष 2014 में भी मानसून ने किसानों की आस तोड़ी थी। मानक से कम केवल 571.54 मिमी बारिश होने की वजह से सरकार ने जिले को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया था, जिसका किसानों का 38 करोड़ रुपये का मुआवजा अब भी बाकी है। लेकिन, एक बार फिर कुदरत यहां से मुंह फेरे हुए है। मौसम वैज्ञानिक वी के सिंह के अनुसार इस साल भी जनपद में सामान्य से कम बारिश होने की संभावनाएं हैं। यह कृषि के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं।