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UP: साहित्यिक पर्यटन के नक्शे पर दर्ज नहीं राष्ट्रकवि का गांव, पूर्व केंद्रीय मंत्री निशंक ने की थी ये घोषणा

Mon, 26 Jan 2026 01:53 PM IST
शाहरुख खान अमरनाथ, अमर उजाला, झांसी

सार

राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त की जन्मभूमि साहित्यिक पर्यटन के नक्शे पर दर्ज नहीं है। पूर्व केंद्रीय मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने मैथिली शरण गुप्त की जन्मभूमि चिरगांव को कवि गांव बनाने की घोषणा की थी।
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मैथिली शरण गुप्त का घर - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
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राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त की जन्मभूमि। साकेत, यशोधरा जैसी काव्य रचनाओं की साधना स्थली। हिंदी साहित्य जगत में बड़ा नाम गौरवशाली सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासत, लेकिन चिरगांव को कवि गांव बनाने का सपना अूधरा है। 
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डिजिटल युग में हजारों किताबें उनकी हवेली के बंद कमरों में धूल फांक रही हैं। पांडुलिपियों समेत कई स्मृतियां धूमिल हो रही हैं। हवेली को लेखकों का इंतजार है।

आजादी से पहले यहां साहित्य सदन नामक जिस प्रेस से राष्ट्रभावना बहती थी, उसका नामोनिशान तक नहीं है। यह वही छापाखाना था, जहां से खड़ी बोली में स्वाधीनता का स्वर जन-जन तक पहुंचा लेकिन दशकों पहले ये मशीनें खामोश हो गईं। 
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अब उनकी किताबें दिल्ली में छपती हैं। कभी यह देश की मुक्ति में योगदान देने वाले लेखकों के विचारों का केंद्र रहा, लेकिन अब कोई लेखक यहां रहकर साहित्य सृजन नहीं करता। 

बताया जाता है कि पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने यहां आकर तीन साल पहले चिरगांव को कवि गांव बनाने की घोषणा की थी और सहयोग देने की बात कही थी। इसके बावजूद यह गांव साहित्यिक पर्यटन के नक्शे पर मजबूती से दर्ज नहीं हो पाया है।

इस मिट्टी ने उस कवि को गढ़ा, जिसने राष्ट्रबोध जगाया और मानव मूल्यों को कविता का प्राण बनाया। उनके योगदान के लिए सन् 1955 में तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें पद्म भूषण से नवाजा। 3 अगस्त 1986 को दद्दा के जन्म शताब्दी समारोह में तत्कालीन राष्ट्रपति आर वेंकटरमन भी उनकी समाधि पर शीश नवाने पहुंचे। 

 

राष्ट्रकवि की हवेली में पद्म भूषण पुरस्कार, डाक टिकट समेत कई धरोहरें सहेज कर रखी गई हैं। उनकी इस विरासत को 30 साल से देखरेख कर रहे राम प्रकाश गुप्ता बताते हैं कि मैथिली शरण गुप्त यानी दद्दा की स्मृतियों और साहित्य को सहेजने के लिए हवेली का एक हिस्सा राजकीय संग्रहालय को देने के लिए उनके पाैत्र साैरभ गुप्ता और डा. वैभव गुप्ता ने स्वीकृति प्रदान है। 
 

नए भवन में उनकी किताबों को डिजिटल स्वरूप में लाने की कोशिश होगी। इसी गांव में उनके नाम पर महाविद्यालय, इंटर काॅलेज और हिंदी माध्यम से विद्यापीठ शिक्षण संस्थान संचालित हो रहे हैं। उनके जमाने में हवेली के दोनों ओर मंदिर थे जो आज भी हैं। एक तरफ जैन मंदिर और दूसरी तरफ वैदेही सरकार का मंदिर। वैदेही सरकार मंदिर में वह स्वयं पूजा करने के लिए जाते थे। 
 

समस्याओं से आजाद नहीं हो पाया चिरगांव
मैथिली शरण गुप्त की हवेली तक पहुंचने के लिए अब भी बेहतर सड़क नहीं है। संकरी सड़कें, जलभराव, बदबूदार खुली नालियां, ये सब उस गांव की सच्चाई हैं, जिसे साहित्य का तीर्थ कहा जाता है। समय बदला, देश बदला, लेकिन स्मार्ट सिटी झांसी से करीब 25 किलोमीटर दूर होने के बावजूद चिरगांव की स्थिति अपेक्षानुरूप नहीं बदली।
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मैथिली शरण गुप्त की समाधि स्थल पर उनके जीवनकाल की लिखीं आखिरी पंक्तियां दिखावे और स्वार्थ के ताने-बाने में उलझे समाज के लिए आज भी आईना हैं-
प्राण न पागल हो तुम यों, पृथ्वी पर है वह प्रेम कहां।
मोह मयी छलना नर है, भटको न अहो अब और यहां।
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