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शेल्टर होम में ताला पड़ा रहा, नगर निगम हर महीने ड़ेढ लाख रुपये देता रहा

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झांसी। नगर निगम के शेल्टर होम में ताले पड़े रहे, लेकिन हर महीने निगम से डेढ़ लाख रुपये का भुगतान किया जाता रहा। लाखों रुपये से बनवाए शेल्टर होम मेें कोई रुकने गया ही नहीं था। मगर नगर निगम ने निजी एजेंसी पर खूब मेहरबानी की। आलम यह रहा कि मार्च में सीमा खत्म होने के बाद भी निजी एजेंसी का कब्जा बरकरार है। अब अधिकारी नऐ सिरे से एजेंसी का चयन करने से बच रहे हैं।
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निराश्रित एवं बेसहारा लोगों को आश्रय मुहैया कराने को नगर निगम ने लहरगिर्द, डड़ियापुरा, पिछोर में शेल्टर होम बनवाए। लाखों रुपये खर्च करके यहां तमाम सारी सुविधाएं जुटाई गईं। कायदे से इनका संचालन नगर निगम को खुद करना चाहिए, लेकिन लंबा-चौड़ा सरकारी अमला होने के बावजूद निगम ने इसका संचालन एक निजी एजेंसी को सौंप दिया। पिछले काफी समय से जनकल्याण समिति नामक संगठन ही इन सारे शेल्टर होम का संचालन कर रहा है। इसकी एवज में नगर निगम पचास हजार रुपये प्रति शेल्टर होम की दर से भुगतान हो रहा है। संचालन के लिए एक वर्ष का करार हुआ। मार्च में यह समयसीमा खत्म हो गई लेकिन, एजेंसी पर मेहरबान अफसरों को इसका पता ही नहीं चला। करार खत्म हो जाने के बाद भी न सिर्फ इन शेल्टर होम पर एजेंसी का कब्जा बरकरार है बल्कि एजेंसी ने करीब तीन लाख रुपये का बिल भी पेश कर दिया। पिछले दिनों हुई जांच में शेल्टर होम के संचालन में तमाम तरह की अनियमितताएं पाई गई हैं। शेल्टर होम में ठहरने वालों के आधार नंबर एवं मोबाइल नंबर रजिस्टर में दर्ज किए जाने थे, लेकिन रजिस्टर में ओवरलैपिंग पाई गई। अधिकांश समय शेल्टर होम में ताले ही बंद रहते हैं, उसके बावजूद लॉकडॉउन अवधि में भी शेल्टर होम के रजिस्टर मेें एंट्री दर्ज पाई गई। यह सारी एंट्री भी फर्जी मिली। इन गड़बड़ियों को देखते हुए लेखा विभाग ने फाइल पर आपत्ति दर्ज करते हुए भुगतान रोक दिया। वहीं, प्रभारी अधिकारी शादाब असलम ने माना कि इनके साथ करार की समयावधि खत्म हो चुकी है लेकिन, उनका कहना है कि नई निविदा कराई गई थी। उन्होंने ही जल्द ही नई निविदा की प्रक्रिया पूरी कराने की बात कही है।
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