दो साल से सूखा की मार झेल रहे किसानों ने इस बार रबी सीजन में सरसों, चना व मटर की बुआई तेज कर दी है। कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को कम पानी में पैदा होने वाली फसलें बोने की सलाह दी थी, जिसका असर दिखाई दे रहा है।
गेहूं की अंधाधुंध फसल पैदा करने से न केवल सिंचाई की ज्यादा आवश्यकता पड़ती है, बल्कि किसानों का खर्च भी अधिक होता है। दो साल से लगातार सूखा पड़ने के कारण किसानों की कमर टूट गई थी। इसलिए कृषि वैज्ञानिकों ने पिछले दिनों हुई रबी गोष्ठी में कम पानी में पैदा होने वाली फसलें बोने की सलाह दी थी। बुआई शुरू हुई तो इसका असर भी दिखाई देने लगा है। ज्यादातर किसान राई, सरसों, तोरिया, अलसी, चना, मटर और मसूर की बुआई कर रहे हैं। बुआई शुरू हुए अभी दस दिन ही बीते हैं। राई और सरसों की बुआई 8,542 हेक्टेयर के सापेक्ष अब तक 3,940 हेक्टेयर में हो चुकी है। तोरिया की बुआई 1,105 हेक्टेयर के सापेक्ष 915 हेक्टेयर, चना की बुआई 43,455 हेक्टेयर के सापेक्ष 3,464 हेक्टेयर, मटर की बुआई 61,692 हेक्टेयर के सापेक्ष 6,640 हेक्टेयर, मसूर की बुआई 12,978 हेक्टेयर के सापेक्ष 1,490 हेक्टेयर क्षेत्रफल में बुआई हो चुकी है। इसमें तिलहनी फसलों की बुआई करीब 49 प्रतिशत और दलहनी फसलों की बुआई लगभग दस प्रतिशत क्षेत्रफल में हो चुकी है।
किसान जिस तरह से कम पानी में पैदा होने वाली फसलों की बुआई करने में रुचि ले रहे हैं, उससे लगता है कि रबी फसलों की बुआई का जो लक्ष्य रखा गया है, वह पूरा हो जाएगा। अभी बुआई का सीजन नवंबर माह तक चलेगा। हालांकि, किसान अलसी की बुआई की तरफ ध्यान नहीं दे रहे हैं। शायद इसीलिए कृषि विभाग ने अलसी की बुआई 362 हेक्टेयर क्षेत्रफल में करने का लक्ष्य रखा है।
किसान जागरूक हो रहा है। वह कम पानी में पैदा होने वाली फसलें और फसल चक्र में बदलाव कर फसलों की बुआई कर रहे हैं।
- डा. बीआर मौर्य
जिला कृषि अधिकारी