ट्रेन के शौचालय में अपनी जान गंवाने वाले मोहन शर्मा ने अपने पिता के इलाज के लिए चार लाख रुपये कर्जा ले रखा था, जिसको लौटाने के लिए वे मुंबई में रात- दिन तीन शिफ्टों में काम कर रहे थे। उनके कंधों पर पत्नी व चार बच्चों के भरण पोषण की भी जिम्मेदारी थी। शुक्रवार को बस्ती से झांसी आए रिश्तेदारों की मौजूदगी में उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। रेलवे से बृहस्पतिवार को एक बेहद दुखद मामला सामने आया था। विगत 23 मई को झांसी से बस्ती के लिए 04168 श्रमिक एक्सप्रेस में सवार होकर जिला बस्ती के थाना गौर क्षेत्र के हलुआ गांव निवासी मोहन शर्मा (38) सवार होकर गए थे। रास्ते में तबीयत बिगड़ने पर उनकी शौचालय में मौत हो गई थी। ट्रेन का खाली रैक जब गोरखपुर से 27 मई की रात झांसी लौटकर आया, तब तक उनका शव शौचालय में ही पड़ा रहा। शव से बदबू आने लगी थी। उनके बैग में मिले कागजातों से उनकी पहचान हो सकी। शुक्रवार को जीआरपी की सूचना पर मोहन के फूफा कन्हैयालाल शर्मा, साला मदनमुरारी, चाचा सरजू प्रसाद, दीपराज शर्मा झांसी आ गए। रिश्तेदारों की मौजूदगी में पोस्टमार्टम होने के बाद शव का झांसी में ही अंतिम संस्कार कर दिया गया। जीआरपी थाने में फूफा ने बताया कि पिछले 15 साल से मोहन मुंबई में रह रहा था। दो साल पहले पिता सुभाष शर्मा को लकवा मार गया था। मोहन ने उनके इलाज के लिए चार लाख रुपये का कर्ज लिया था। इलाज में पैसा लगाने के बाद भी उनकी एक साल पहले मौत हो गई। कर्जा लौटाने के लिए वे मुंबई में कड़ी मेहनत कर रहे थे। वे दिन में प्राइवेट कंपनी में काम और रात में लोडिंग गाड़ी चलाते थे। गाड़ी में माल चढ़ाने व उतारने का भी काम करते थे, ताकि जल्दी से जल्दी कर्जा चुकता हो जाए। मोहन के तीन बेटे व एक बेटी है। चारों बच्चे छोटे हैं। उनका आरोप था कि रेलवे की लापरवाही से मोहन की जान चली गई।