फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

शिक्षा का मोल इनसे पूछिए... पढ़ाई के खातिर दूध और अंडे बेच रहे नौनिहाल

विज्ञापन
विज्ञापन
झांसी। कौन कहता है कि आसमां में सुराख नहीं होता...एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों। कवि दुष्यंत की यह रचना उन नौनिहालों पर बिल्कुल सटीक बैठती है जिनके पास पढ़ने के लिए हाईफाई स्कूल और मोटी फीस भरने के लिए पैसे नहीं हैं। जो अच्छे खानपान के लिए भी मोहताज हैं, फिर भी उनमें शिक्षा की ललक है। शहर में ऐसे कई नौनिहाल हैं...जो पढ़-लिखकर अच्छी जिंदगी जीना चाहते हैं पर उनके पास संसाधन नहीं हैं। विश्व साक्षरता दिवस पर हमने कई ऐसे बच्चे देखे जो कुछ ऐसी ही विषय परिस्थितियों से जूझकर अपने लिए एक आसमां बना रहे हैं। बेहद गरीब परिवार के ये बच्चे शहर के गुरुकुल स्कूल में पढ़ रहे हैं। जहां अपनी और अपने भाई-बहनों की फीस भरने के लिए ये बच्चे स्कूल के बाद न सिर्फ काम करके मेहनत से पैसा जुटा रहे...। इनमें कोई ठेला किराये पर लेकर अंडा बेच रहा तो कोई दूध बेच रहा। ये नौनिहाल उन युवाओं के लिए प्रेरणा भी हैं जो संसाधन न होने का हवाला देकर या तो डिप्रेशन में चले जाते हैं या फिर पढ़ाई बीच में ही छोड़ देते हैं। वहीं, स्कूल के शिक्षक भी लगातार इन बच्चों को प्रेरित कर रहे हैं। कई बच्चे सहारिया और कबूतरा जाति के भी हैं।
विज्ञापन

फीस के लिए दुकान पर काम कर रहा अमित
10वीं कक्षा में पढ़ने वाला छात्र अमित श्रीवास गुमनवारा क्षेत्र में रहता है। अमित के पापा एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते हैं, मां खाना बनाने का काम करती है। बहन निकिता भी स्कूल में कक्षा छह की छात्रा है। अमित स्कूल के बाद रात 9 बजे तक एक ज्वैलरी की दुकान में काम करता है। इससे मिले वेतन से वह अपनी व बहन की फीस जमा करता है।
मेडिकल कॉलेज के पास अंडे बेचता है छोटू
दसवीं में पढ़ने वाला छोटू अहिरवार पिछोर क्षेत्र में रहता है। वह स्कूल से छूटने के बाद शाम 6 बजे से रात 12 बजे तक मेडिकल कॉलेज के पास अंडे की एक दुकान में काम करता है। उसके पापा मिस्त्री हैं। कोरोना के बाद से पापा को ठीक से काम नहीं मिला। उसके भाई ने भी गुरुकुल स्कूल से अच्छे नंबरों में इंटर पास किया है। बहन भी पढ़ रही है। पढ़ाई के लिए वह पांच हजार रुपये में काम करता है।
विज्ञापन

---
अपनी और भाई की फीस भरता है राज
स्कूल में अपनी और कक्षा पांच में पढ़ रहे छोटे भाई लक्ष्य की फीस भरने के साथ-साथ इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए पैसा जमा कर रहे गुरुकुल स्कूल के छात्र राज सिंह दांगी ने बताया कि उसकी और भाई की पढ़ाई चलती रहे इसके लिए वह एक साल से दोपहर 2 बजे से लेकर रात 8 बजे तक दूध की एक दुकान में काम कर रहा है। उसके पापा किसान हैं।
--
76 फीसदी अंक, कर रहा 3500 की नौकरी
11वीं कक्षा में पढ़ने वाला गुमनवारा का निर्देश वर्मा मेधावी छात्र है। उसकी मां साफ-सफाई का काम करती हैं और पापा मिस्त्री हैं। निर्देश बताता है कि उसका एक बड़ा भाई और एक छोटी बहन है। बहन भी उसी के स्कूल में पढ़ती है। वह खूब पढ़ना चाहता है। 10वीं में 76 फीसदी नंबर पाने वाला निर्देश छह महीने से मेडिकल कॉलेज के पास एक चश्मे की दुकान में 3500 रुपये महीने की नौकरी कर रहा। 08 सितंबर को साक्षरता दिवस को लेकर कहा कि अच्छी शिक्षा उसे अच्छा जीवन दे सकती है।
--
किराये पर ठेला लेकर करता है काम
पिछोर में अपने चाचा-चाची के साथ रहने वाले कक्षा 12 के छात्र देवेंद्र कुमार स्कूल के बाद अपनी अंग्रेजी दुरुस्त करने के लिए कोचिंग जाते हैं। इसके बाद शाम 6 से लेकर रात 10 बजे तक किराये पर एक ठेला लेकर अंडे बेचने का काम करते हैं। देवेंद्र बताते हैं कि उसके माता-पिता मोंठ के पास गांव में रहते हैं।
‘कूड़ा’ को बनाया अभिषेक...‘कचरा’ को अहोभाग्य
विश्व साक्षरता दिवस आज :
शहर के एक स्कूल में पढ़ रहे सहारिया, कबूतरा और गरीब परिवारों के मेधावी जला रहे शिक्षा की अलख
500 से अधिक बच्चे बेहद गरीब परिवारों से
अनीता वर्मा
झांसी। आज विश्व साक्षरता दिवस है। शहरों में जगह-जगह इसे लेकर बड़े-बड़े आयोजन होंगे। साक्षरता के आंकड़ों पर लंबी-लंबी दलीलें दी जाएंगी। लेकिन जरूरत है तो बस एक ऐसी शुरूआत की...जहां निरक्षरता और तमाम आर्थिक संकटों में घिरे नौनिहाल शिक्षा का महत्व समझ सकें। गुमनावारा में एक ऐसा ही स्कूल चल रहा है। स्कूल कहने को तो प्राइवेट है लेकिन इस स्कूल के 80 फीसदी से अधिक बच्चे सहारिया, कबूतरा जाति और गरीब परिवारों के हैं। अधिकांश के माता-पिता हर महीने उनकी मामूली सी फीस भरने में भी अक्षम हैं। ऐसे में कई बच्चे अपनी और अपने भाई-बहनों की फीस के लिए स्कूल के बाद कहीं न कहीं काम भी करते हैं। शिक्षकों के प्रयास से सड़कों पर पन्नी बीनने वाले बच्चे कूड़ा को अभिषेक और कचरा को अहोभाग्य नाम देकर उन्हें शिक्षा दी गई। कई बच्चे यहां निशुल्क भी पढ़ते हैं।
स्कूल की प्रधानाचार्य अर्चना गुप्ता बताती हैं कि शुरूआत में स्कूल मेडिकल कॉलेज के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी द्वारा दान दी गई जमीन पर चलता था। बाद में पास में ही थोड़ी-थोड़ी जमीन लेकर स्कूल शिफ्ट किया गया। वर्ष 1998 में गुमनावारा में जहां यह स्कूल खोला गया वहां आसपास सहारिया और कबूतरा जाति के बच्चों के अलावा गरीब परिवारों की बस्तियां थीं। ये बच्चे सड़कों पर कहीं कूड़ा बीनते थे तो कहीं भीख मांगते थे। पहले इन बच्चों को स्कूल बुलाया जाता था तो वहां के लोग शिक्षकों को भगा देते थे। ऐसे में स्कूल में पढ़ चुकी उसी बस्ती में रहने वाली छात्रा गीता सहारिया, शिक्षक हरचरन पाल व एक अन्य शिक्षक के साथ बस्ती के पास रहने वाले शिक्षक सूरजभान की मदद लेकर बच्चों को बस्ती से स्कूल तक लाया गया। पूर्व में सभी को निशुल्क पढ़ाया गया। इनमें सैकड़ों इंटर पास होकर निकले और अच्छी जगह नौकरी करने लगे, जो पढ़ रहे हैं उसमें यूपी बोर्ड में 10-12वीं के बच्चे 70 प्रतिशत से अधिक अंक पा रहे। उन्होंने बताया कि शिक्षिका सुल्ताना खातून भी इसमें लगातार सहयोग करती हैं। उधर, कई बच्चों के नाम कूड़ा-कचरा, कबूतर आदि थे, ऐसे बच्चों के नाम भी बदले जाते हैं। आज स्कूल में 800 बच्चों में से 500 से अधिक बच्चे ऐसे ही गरीब और पिछड़े परिवारों से हैं। कई बच्चे ऐसे हैं जो बेसहारा बुजुर्गों का अंतिम संस्कार भी करते हैं। प्रधानाचार्य के सहयोग से बच्चे स्कूल के एडमिनिस्ट्रेटर का अंतिम संस्कार भी कर चुके हैं।
विज्ञापन

---------
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें