मरना ही है तो अपनों के बीच में जाकर मरेंगे
महाराष्ट्र से आए मजदूरों से जब पूछा गया कि कोराना संक्रमण फैल रहा है ऐसे में वह भीड़ के साथ आ रहे हैं उन्हें डर नहीं लग रहा। इस पर चंदौली के विकास का कहना था कि अगर मरना ही है तो अपनों के बीच जाकर न मरें। यहां बेगानों के बीच में क्यों रहें। वैसे भी जब काम धंधा सब बंद हो गया है तो भूखे ही मर जाएंगे। गोरखपुर के सुभाष का कहना था कि मजदूर रोज खाता है और रोज कमाता है। अब पैसा बचा ही नहीं तो परिवार को कैसे पालेंगे। लिहाजा अपने गांव जा रहे हैं। कम से कम वहां उधार-पानी करके जुगाड़ तो चला लेंगे।
सावधान हो जाइए, मजदूरों को ढो रहे वाहनों के ड्राइवर कई दिनों से सोए नहीं
इस समय सबसे ज्यादा वाहन महाराष्ट्र से आ रहे हैं। इनमें ट्रक सबसे ज्यादा हैं। पिछले चार दिनों में 5000 से ज्यादा वाहन आ गए होंगे। झांसी से महाराष्ट्र की दूरी ही 1000 किलोमीटर के करीब होगी। अब एक चालक ही गाड़ी लेकर आ गया है। रास्ते में कहीं थोड़ी बहुत देर को ट्रक रोककर नींद ले लेते हैं वरना तो गाड़ी चलती ही रहती है। नासिर निवामी इकराम भी अपना ट्रक लेकर आया है। वह भी महाराष्ट्र से अकेला ही आया है। मुश्किल से दो से तीन घंटे सो पा रहा है। ऐसे में वह भी ड्राइविंग के दौरान ऊंघता ही होगा। अब ऐसे में सुरक्षित सफर की बात भला कैसे कर सकते हैं। नासिक का ही हरिवर्मा भी ट्रक लेकर आया है। रक्सा बार्डर पर उससे बात हुई तो कहने लगा कि वह तो इससे भी अधिक दूरी तक गाड़ी चला लेता है लेकिन थकान नहीं होती। मगर यह भला कैसे संभव है। नींद तो जरूरी है ही। अगर चालक की नींद पूरी न हो तो बड़ा हादसा हो सकता है। कार लेकर भी लोग महाराष्ट्र से आए हैं। छोटा हाथी लगातार चल रहा है।
सरकार के आदेश का पालन कराने कहीं नहीं उतरी मशीनरी
औरेया हादसे से बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने साफ निर्देश दिए हैं कि कहीं भी मजदूरों को असुरक्षित तरीके से नहीं लाया जाएगा। लेकिन झांसी में कई जगह ट्रक, छोटा हाथी, कंटेनर और लोडर तक से मजदूरों को ढोया जा रहा था। न इन वाहनों को कहीं रोका गया और न ही किसी चालक को टोका गया। स्थिति यह है कि इन वाहनों के चालक कई दिनों से गाड़ी चला रहे हैं। नहीं भी पूरी नहीं हो पा रही है। ऐसे में कभी भी हादसा हो सकता है। लेकिन मजदूरों की सुरक्षा को लेकर कोई गंभीर ही नहीं है।
अपने घर जाने के लिए ट्रकों में चढ़ाया जा रहा है मजदूरों को।
कंटेनर में ठसाठस भरकर जाते मजदूर।