झांसी। सूखे बुंदेलखंड में संजीवनी की तरह इस्तेमाल की गई मनरेगा जनपद में 14 जून से पूरी तरह ठप है। सारे प्रोजेक्ट बंद हो गए हैं। कारण, धनराशि का अभाव। ऐसे में मजदूर बेरोजगार हो गए हैं। करोड़ों रुपये मजदूरों के और ठेकेदारों के अटके पड़े हैं। अधिकारी बजट न होने का रोना रो रहे हैं।
बुंदेलखंड में सूखे के चलते किसानों का पलायन देखते हुए उसे रोकने के लिए केंद्र सरकार ने यहां मनरेगा के तहत तेजी से काम कराए जाने का निर्णय लिया था। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट में भी हलफनामा दिया गया था। यहां स्थिति इसके उलट है। गत 14 जून से मनरेगा का काम पूरे जनपद के आठों ब्लाक में ठप है। मजदूरों व ठेकेदारों को देने के लिए फिलहाल शासन के पास धनराशि नहीं है।
14 जून से पहले ही शासन पर करोड़ाें रुपयों की बकाएदारी हो गई है। वित्तीय वर्ष 2015-16 का ही 48 लाख रुपया मैटेरियल का बकाया है। इसी प्रकार चालू वित्तीय वर्ष का बकाएदारी का आंकड़ा भी सीडीओ (मुख्य विकास अधिकारी) नहीं दे सके।
गौरतलब है कि जनपद में एक लाख 70 हजार जॉब कार्ड धारक हैं। प्रतिदिन 30 हजार मानव दिवस सृजित होते हैं। इनके लिए ठेकेदारों से मैटेरियल भी मंगाया जाता है। इन सबकी देनदारी पूरी नहीं हुई। इसलिए ठेकेदार ने मैटेरियल देना बंद कर दिया और मजदूरों ने काम करना बंद कर दिया। इससे पिछले 14 दिनों से मनरेगा पूरी तरह बंद हो गई और मजदूर बेरोजगार हो गए।
वर्तमान में जिले में शासन द्वारा 300 से अधिक प्रोजेक्ट चलाए जा रहे हैं। मनरेगा के तहत इन प्रोजेक्ट में जॉब कार्ड धारकों से काम कराया जाना है। लेकिन रुपये न होने के कारण सारे काम बंद हो गए।
‘सभी खंड विकास अधिकारियों के साथ बैठक कर उन्हें पिछली बकाएदारी दो दिन में निपटाने के निर्देश दिए गए हैं। जल्द ही ठेकेदारों को मैटेरियल का और मजदूरों को उनकी मजदूरी का पैसा मिल जाएगा। इसके साथ ही मनरेगा का काम भी शुरू करा दिया जाएगा।’
- चंद्र विजय सिंह, मुख्य विकास अधिकारी