फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बूंदबूंद पानी के लिए तरसते महानगर वासियों मेट्रो के सफर का सपना देखिए

विज्ञापन
विज्ञापन
झांसी। योगी सरकार ने बजट में 200 करोड़ रुपये का प्रावधान कर शहर वासियों को मेट्रो का सपना तो दिखा दिया लेकिन बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे लोगों के लिए यह किसी सब्जबाग किसी से अधिक नहीं है। सीपरी समेत आधा शहर देर रात जागकर कुछ मिनट पानी आने का इंतजार करता है। प्रेशर इतना कम आता है कि एक बाल्टी भरने में आधा घंटा लगता है। कई इलाकों में गंदा, बदबूदार पानी आता है। गर्मियां आने को हैं पानी का संकट गहराना तय है। सरकार ने बजट में ग्रामीण पेयजल व्यवस्था सुधारने की तो पहल की है पर झांसी की समस्या जस की तस है। शहरवासी इस विकराल समस्या के कारगर समाधान के लिए बजट पर टकटकी लगाए थे।
विज्ञापन

झांसी में मेट्रो ट्रेन के एलान के साथ ही बजट का इंतजाम करके झांसीवासियों के सपनों में उड़ान भर दी। इस बार खास बात यह है कि सरकार ने मेट्रो अथवा लाइट मेट्रो के लिए शुरूआत में 200 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। इससे काम कुछ आगे बढ़ने की उम्मीद है हालांकि बजट में यह साफ नहीं है कि यह पैसा किस महकमे के मार्फत खर्च किया जाएगा।
झांसी में मेट्रो का एलान पहले भी किया जा चुका लेकिन, अबकी बार बजट के प्रावधान करने से यह बात एक कदम आगे बढ़ी है। यूपी सरकार अभी सिर्फ लखनऊ में ही मेट्रो चलवा सकी है जबकि प्रयागराज, कानपुर, मेरठ जैसे शहरों में डीपीआर बनाने का काम पिछले करीब पांच साल से चल रहा है। तकनीकी जानकारों का कहना है कि मेट्रो प्रोजेक्ट में काफी खर्च आने के साथ ही काफी समय भी लगता है। डीपीआर (डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट) तैयार करने में ही करोड़ों रुपये खर्च हो जाते हैं। भूमि परीक्षण समेत तमाम सारी तकनीकी जांच करनी होती है। लंबी प्रक्रिया के बाद ही रुट तय होने का काम शुरू होता है। अगर समय पर बजट मिलता रहे तब भी इस काम के पूरा होने में पांच साल से अधिक लगना तय है। बजट में शहर के पानी की समस्या का समाधान न होने से लोगों में निराशा दिखी।
विज्ञापन

एक किलोमीटर पर 960 करोड़ से अधिक लागत
काफी खर्चीला है मेट्रो का सफर
मेट्रो का सफर अरामदायक तो होता है लेकिन, यह प्रोजेक्ट काफी खर्चीला भी होता है। भारी-भरकम बजट होने से ही तमाम दूसरे शहरों में इसके प्रोजेक्ट रफ्तार नहीं पकड़ पा रहे। प्रयागराज, कानपुर, मेरठ जैसे शहरों में इसका काम प्राथमिक दौर से आगे ही नहीं बढ़ सका। तकनीकी जानकारों के मुताबिक मेट्रो लाइन बिछाने में प्रति किलोमीटर करीब 960 करोड़ रुपये खर्च आता है। अगर मेट्रो लाइन अंडर ग्राउंड बिछाई गई तब इसकी लागत दोगुनी हो जाती है। मेट्रो लाइन बिछाने के साथ ही इसका रखरखाव भी काफी महंगा होता है। इसी वजह से तमाम बड़े शहर इसकी जगह सार्वजनिक परिवहन के लिए इलेक्ट्रिक बसों को तरजीह देते दिखते हैं। झांसी में स्मार्ट सिटी मिशन के तहत इलेक्ट्रिक बसें स्वीकृत हो चुकी हैं। 25 करोड़ की लागत से इन बसों को खरीदा जाना है। इन बसों के संचालन के जल्द शुरू होने की उम्मीद है।
झांसी को मेट्रो की सौगात देकर सरकार ने प्रशंसनीय काम किया है। पहली बार बजट का इंतजाम किया गया है। विस्तृत जानकारी आने के बाद नगर निगम इस दिशा में काम शुरू करेगा।
विज्ञापन

रामतीर्थ सिंघल
महापौर
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें