झांसी। हिंदी के माथे पै बिंदी बुंदेली की धरदई, इस पंक्ति को चरितार्थ करने वाली बुंदेलखंड की बैटी मैत्रेयी पुष्पा के चर्चित उपन्यास इदन्नमम को बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से बाहर किए जाने पर साहित्यकार आहत हैं। उन्होंने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए बुंदेलखंड की धरती का अपमान बताया है।
वरिष्ठ उपन्यासकार डा. पीके अग्रवाल का कहना है कि बुंदेलखंड विश्वविद्यालय तथा सरकार का यह निर्णय बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। बुंदेलखंड की बेटी मैत्रेयी पुष्पा ने इदन्नमम उपन्यास के माध्यम से बुंदेलखंड की राजनीतिक व सांस्कृतिक झलक को पूरे देश तक पहुंचाया है। अग्रवाल का कहना है बुंदेलखंड के ही आचार्य महाकवि केशव की कृतियां बीयू के कोर्स में नहीं हैं, जबकि इलाहाबाद विश्वविद्यालय में महाकवि केशव की कृतियां अभी भी पाठ्यक्रम में शामिल हैं। अग्रवाल ने कहा मैत्रेयी पुष्पा बुंदेलखंड की शान हैं। उनके अलमा कबूतरी उपन्यास व ललमनियां जैसे कहानी संग्रह भी बुंदेलखंड की सांस्कृतिक विरासत व परंपराओं को उजागर करते हैं।
इतिहासकार हरगोविंद कुशवाहा का कहना है कि विश्वविद्यालय का यह निर्णय अफसोसजनक है। बुंदेलखंड के जीवन दर्शन को उजागर करने वाले उपन्यास को बीयू के पाठ्यक्रम से बाहर किया जाना बुंदेलखंड की धरती का अपमान है। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय को अपने इस निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए।
पाठ्यक्रम में रखना और बाहर करना विश्वविद्यालय का अधिकार: मैत्रेयी पुष्पा
झांसी। इदन्नमम को बीयू के कोर्स से बाहर किए जाने के सवाल पर इस उपन्यास की लेखिका मैत्रेयी पुष्पा ने कहा कि किसी भी कृति को पाठ्यक्रम में रखना और बाहर करना विश्वविद्यालय का अपना अधिकार है। पिछले पांच वर्ष से यह उपन्यास विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल था। उन्होंने कहा कि उनका उपन्यास इदन्नमम बुंदेलखंड की पृष्ठभूमि पर है, इसके अलावा अलमा कबूतरी व ललमनियां जैसी कृतियों में भी बुंदेलखंड की राजनीतिक व सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का समावेश है।