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मजदूरों ने महानगरों का छोड़ा साथ, अपने गांव में भी रह गए खाली हाथ

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झांसी। चिलचिलाती धूप हो या सितम ढा रही हो सर्दी, मजदूरों के हाथ कभी नहीं रुकते हैं। वे हर हाल में अपनी मेहनत के बलबूते पर अपनी रोटी का प्रबंध कर लेते हैं। लेकिन, कोरोना काल में पिछले एक साल से श्रमिकों पर बदहाली छाई हुई है। मेहनत करने का जज्बा बरकरार है, परंतु हाथों को काम नहीं मिल रहा है। महामारी के खतरे के बीच वे देश के बड़े शहरों से वापस अपने गांवों में लौट आए हैं, लेकिन यहां भी बेरोजगारी के आलम में गुजर-बसर करने को मजबूर हैं।
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कोरोना वायरस के संक्रमण के नियंत्रण के लिए पिछले साल लागू किए गए लॉकडाउन के दरम्यान सबसे बुरे हालातों से श्रमिकों को दो-चार होना पड़ा था। महानगरों में काम न मिलने पर वे सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर झांसी आ पहुंचे थे। उन्हें उम्मीद थी कि अपनी धरती पर जैसे-तैसे कर दो जून की रोटी का प्रबंध कर लेंगे। कोई खेती के काम में जुट गया था, तो किसी ने आसपास हो रहे निर्माण कार्यों में अपना योगदान देने लगा था। तब 23 हजार प्रवासी मजदूर वापस झांसी लौटे थे। लेकिन, हालत सामान्य होने पर वे एक बार फिर वे गुजरात, मुंबई, दिल्ली, हरियाणा काम की जुगाड़ में पहुंच गए थे। कुछ महीने ही वे वहां ठहर पाए कि एक बार फिर से कोरोना वायरस ने उनके रोजगार पर हमला बोल दिया। काम छिन जाने के बाद वे वापस गांवों में लौट आए हैं। लेकिन, उनके हाथ खाली है। कोरोना की दूसरी लहर के चलते अब तक 10 हजार से अधिक प्रवासी मजदूर वापसी कर चुके हैं, लेकिन उनको रोजगार देना का कोई इंतजाम नहीं है। सरकारी और निजी निर्माण ठप पड़े हुए हैं। मनरेगा का भी बुरा हाल है। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि मनरेगा के तहत सवा लाख श्रमिक पंजीकृत हैं। लेकिन, इनमें से बमुश्किल पांच हजार ही काम पर लगे हुए हैं। इन्हें भी नियमित रूप से काम नहीं मिल पा रहा है।
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