महानगर में पानी का सत्तर करोड़ का कारोबार, फिर भी नहीं बुझ रही प्यास
झांसी। महानगर वासी प्यास बुझाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रहे हैं। इसके बाद भी उनकी प्यास नहीं बुझ रही है। किसी को हैंडपंपों से पानी भरना पड़ रहा है तो कोई टैंकरों के पानी से प्यास बुझाने का मजबूर है। महानगर में पानी का कारोबार करोड़ों रुपये का है। पानी के प्राइवेट टैंकर चल रहे हैं, आरओ वाटर प्लांटों से पानी की सप्लाई हो रही है, हैंडपंपों और बोरिंग से भी प्यास बुझाई जा रही है।
महानगर की जनसंख्या 505693 है। इतने लोगों की प्यास बुझाने के लिए महानगर में 29 ट्यूबवेल लगे हैं और 3286 हैंडपंप है। पानी की आवश्यकता 78.51 एमएलडी की है, जबकि पानी की उपलब्धता 65.47 एमएलडी है। एक एमएलडी में 10 लाख लीटर पानी होता है। चूंकि पूरे शहर में पानी की पाइपलाइन नहीं डाली गई है, इसलिए महानगर के पचास हजार घरों में ही पानी के कनेक्शन हैं। प्रत्येक घर से सालाना बिल 1394 रुपये वसूला जाता है। शहर में एक लाख से अधिक मकान हैं। यानी लगभग आधे मकानों तक पानी की पाइपलाइन है। बाकी हैंडपंप व निजी बोरिंग के भरोसे हैं। एक घर पर प्रति माह के हिसाब से आकलन करें तो करीब 14.70 करोड़ रुपये प्रतिमाह राजस्व आता है। महानगरवासियों को पानी की आपूर्ति के लिए माताटीला बांध से पाइपलाइन डाली गई है। इस पर जलसंस्थान 3.50 करोड़ रुपये महीना खर्च करता है। निजी बोरिंग और हैंडपंप से पानी की आपूर्ति होती है सो अलग। गर्मियों में टैंकरों का संचालन किया जाता है। इन दिनों विभाग चालीस टैंकर संचालित कर रहा है। इस पर चार महीने में करीब एक करोड़ रुपये खर्च आएगा। क्षेत्र बड़ा होने के कारण टैंकरों से भी आपूर्ति नहीं हो पाती है। इसलिए प्राइवेट टैंकरों का कारोबार भी खूब चल रहा है। लगभग तीन सौ चक्कर प्राइवेट टैंकरों से प्रतिदिन लगाए जा रहे हैं। यानी जितने टैंकर सरकारी लगभग उतने ही टैंकर प्राइवेट काम कर रहे हैं। एक प्राइवेट टैंकर पांच सौ से एक हजार रुपये में मिलता है। दूरी के हिसाब से दाम बढ़ जाते हैं। यदि पांच सौ रुपये ही प्रति टैंकर खर्च मान लें तो प्रतिदिन तीन सौ टैंकर के डेढ़ लाख रुपये खर्च हो जाता है। इसके अलावा पचास आरओ वाटर प्लांट लगे हैं। इन प्लांटों से भी पानी की आपूर्ति होती है। यह पानी अधिकतर दुकानों, होटलों, शादी समारोहों या अन्य आयोजनों में पहुंचाया जाता है। इस पर प्रति कैंपर 20 रुपये खर्च के हिसाब से प्रतिदिन करीब आठ हजार दुकानों, 147 नर्सिंग होम, 175 गोदाम, 272 व्यावसायिक भवन और लगभग दस हजार घरों में पहुंचाया जाता है। करीब एक लाख रुपये का कारोबार हे। यानी पानी के लिए लोगों का लाखों रुपये खर्च हो रहा है। इसके बाद भी पानी का संकट है। लोग पानी के लिए हैंडपंपों व टैंकरों पर लाइन लगाए मिल जाएंगे। इस तरह महीने में लगभग साठ से सत्तर करोड़ रुपये का कारोबार हो जाता है।
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मीटरिंग सिस्टम लागू नहीं
महानगर में नल से पानी लेने के लिए मीटरिंग सिस्टम लागू नहीं है। यहां पर मकान चाहे सौ वर्ग मीटर में हो अथवा पांच सौ वर्ग मीटर में, नल का बिल 1394 रुपये सालाना आएगा। क्योंकि यहां पर मीटर सिस्टम लागू नहीं है। बल्कि 1999 से लागू व्यवस्था चल रही है। इसका लोग दुरुपयोग भी करते हैं। क्योंकि, जिनके मकानों में लॉन है, वह इसकी सिंचाई में घरेलू पीने का पानी उपयोग करते हैं। कुछ लोग वाहनों की धुलाई में इसका उपयोग कर रहे हैं। करीब 55 वाहन धुलाई सेंटर हैं, लेकिन अधिकांश पंजीकृत नहीं हैं और धड़ल्ले से वाहनों की धुलाई का काम कर रहे हैं। एक मोटरसाइकिल से पचास रुपये और कार के दो सौ से तीन सौ रुपये तक वसूले जाते हैं। यह बात अलग है कि कोरोना के कारण मार्केट बंद चल रहा है।
दो करोड़ रुपये कर्मचारियों पर खर्च
जल संस्थान के कर्मचारियों के वेतन पर प्रतिमाह 91 लाख रुपये खर्च होते हैं। इसके अलावा पाइपलाइन की मरम्मत के लिए कर्मचारी, वाल्व मेन, चौकीदार और, हैंडपंप रिपेयरिंग के लिए लगे कर्मचारियों पर प्रतिमाह 25 लाख रुपये खर्च होता है। लगभग 80 लाख रुपये पेंशन पर खर्च होता है। कुल मिलाकर दो करोड़ रुपये प्रति माह कर्मचारियों पर खर्च किया जाता है।
बिजली पर खर्च एक करोड़
जलसंस्थान लोगों तक पानी पहुंचाने के लिए लगभग एक करोड़ रुपये की जिबली खर्च करता है। इससे ट्यूबवेल और पंपिंग स्टेशन चलते हैं। कहीं पर पांच हार्स पावर की मशीन लगी है तो कहीं बीस हार्स पावर की मशीन है।
इन क्षेत्रों में अधिक संकट
वीरांगना नगर, महाराणा प्रताप नगर, मयूर विहार कॉलोनी, राजपूत कॉलोनी, डड़ियापुरा, भगवंतपुरा, कोछाभांवर, सिमरधा, सिल्वर्टगंज, गरियागांव, खैरागांव, सरांय, पाल कॉलोनी, सिद्धेश्वर नगर, ताज कंपाउंड, मुरारी नगर, सूजे खां खिड़की, कपूर टेकरी, दरीगरान, मुकरयाना, बिसातखान्रा, बाहर उनाव गेट, अलीगोल, मेवातीपुरा आदि में गर्मियों में पानी का संकट गहरा जाता है।
वर्जन
लोगों तक पानी पहुंचाने का पूरा प्रयास किया जा रहा है। जहां से भी शिकायत आती है, उसे तत्काल दूर करने का प्रयास रहता है। अभी पूरे महानगर में पानी की आपूर्ति का नेटवर्क नहीं है, लेकिन अम्रुत योजना के तहत इसका काम चल रहा है। शहर में मीटर पद्धति लागू करने के लिए शासन को भेजने के लिए प्रस्ताव तैयार हो रहा है। इसमें एक कमेटी बनाकर सुझाव मांगे जाएंगे कि किस से कितना बिल लिया जाए। अभी इस योजना पर मंथन चल रहा है। - कुलदीप सिंह, अधिशासी अभियंता, जल संस्थान।