महादेव सट्टा एप संचालक सौरभ चंद्राकर का गुर्गा निशांत यादव उर्फ रोलेक्स समेत उसके साथियों के पकड़े जाने के बाद सटोरियों ने कई चौंकाने वाले खुलासे किए।
सटोरियों ने पूछताछ के दौरान सट्टा बाजार में बह रहे पैसों के बारे में पुलिस को बताया कि इस वजह से महादेव एप की फ्रेंचाइजी (पैनल) मोटी रकम में बिक रही है। अभी झांसी में 30-35 लाख में सटोरियों ने पैनल खरीद रखे हैं। पैनल खरीदने पर महादेव एप के माध्यम से उसे 10-12 हजार ग्राहक दिए जाते हैं। इन ग्राहकों से जीत-हार का पूरा पैसा फ्रेंचाइजी लेने वाले को मिलता है। इतने सारे ग्राहक एक साथ मिल जाने से सटोरियों के बीच इसका पैनल लेने की होड़ रहती है। इस वजह से इसका दाम भी लगातार बढ़ता जा रहा है।
सटोरियों ने ही पुलिस को बताया कि झांसी में एक दर्जन से अधिक पैनल संचालित हो रहे हैं। पुलिस पैनल चलाने वालों को तलाश रही है। शुक्रवार को निशांत यादव उर्फ रोलेक्स की गिरफ्तारी के बाद पैनल संचालक यहां से भाग निकले। पुलिस ने सटोरियों के पास से दो रजिस्टर समेत एक डायरी बरामद की थी। रजिस्टर एवं डायरी में अगस्त महीने में ही करीब 1.16 करोड़ के लेनदेन का हिसाब दर्ज था। पुलिस का कहना है कि इस हिसाब से प्रतीत होतो है कि हर माह करोड़ों रुपये का लेनदेन हो रहा है।
इस मामले में सीओ सिटी लक्ष्मीकांत गौतम का कहना है कि शहर में महादेव ऐप संचालित कर रहे सटोरियों की तलाश की जा रही है। कई संदिग्ध रडार पर हैं।
डेटा की ज्यादा खपत ने सटोरियों तक पहुंचाया
सटोरियों तक पहुंचने में पुलिस के लिए मददगार इस इलाके में इस्तेमाल हो रहा अत्याधिक डेटा बना। कोतवाली इलाके की पॉश पशुपति कॉलोनी में सटोरियों ने किराए का मकान लिया था। उन्होंने भारी डेटा खपत के लिए अधिक क्षमता के राउटर लगवाए। पुलिस ने यह राउटर भी यहां से बरामद किए। सर्विलांस टीम को छानबीन में मालूम चला कि कॉलोनी के एक घर से रोजाना करीब 200-250 जीबी डेटा की खपत हो रही। इसके बाद पुलिस ने रेकी शुरू की। आसपास पूछताछ करने पर संदिग्ध लोगों के बारे में पता चला। इसके बाद पुलिस ने छापा मारा। इसके पहले 19 जुलाई को कोतवाली इलाके के उनाव गेट निवासी फरीद उर्फ बाबा मिस्त्री को यहां भी अत्याधिक डेटा खपत होने पर छापा मारकर सटोरियों को पकड़ा गया था। एसपी सिटी ज्ञानेंद्र सिंह का कहना है कि इस मामले में अभी कई लोग फरार हैं। उनको भी पुलिस टीम तलाश रही है।
सिग्नल एप का करते थे इस्तेमाल
सटोरिए पुलिस से बचने के लिए तकनीक का भी इस्तेमाल करते हैं। पुलिस कई बार कॉल हिस्ट्री, लोकेशन से पता लगा लेती है। व्हाट्सएप भी ट्रैक हो जाता है। इससे बचने के लिए सटोरिये अब सिग्नल नामक मैसेजिंग एप का इस्तेमाल करने लगे। सिग्नल पर भेजे गए संदेश और कॉल केवल प्रेषक और प्राप्तकर्ता के पास ही होते हैं। पुलिस के हत्थे चढ़े सभी सटोरियों के मोबाइल फोन में सिग्नल एप मिला। इसके सहारे ही वह संदेश एक दूसरे को भेजते थे।