झांसी। जन्माष्टमी का त्योहार कुछ दिनों बाद धूमधाम के साथ मनाया जाएगा लेकिन, जिन गायों से कान्हा को सर्वाधिक प्रेम था बुंदेलखंड में वे बदहाल हैं। सरकारी व्यवस्था उनकी पुकार सुन नहीं रहीं। झांसी में भी गोशालाओं में बड़े-बड़े सरकारी दावे खोखले साबित हो रहे हैं। जनपद में एक तिहाई से अधिक गोशालाएं ऐसी हैं जहां शेड तक नहीं बन सका। खुराक बचाने की खातिर तमाम आश्रयस्थलों से गोवंशों को गांव में ही खदेड़ दिया जाता है।
अन्ना जानवरों से बुंदेलखंड का इलाका सर्वाधिक पीड़ित है। सरकारी आकड़ों के मुताबिक झांसी में 26 हजार से अधिक गोवंशीय सड़कों पर हैं। इनमें चालीस फीसदी सांड़ हैं जबकि साठ फीसदी गाय हैं। पशुधन अधिकारियों का कहना है अधिक उम्र हो जाने अथवा दूध न दे पाने की स्थिति में गाय को बाहर हांक दिया जाता है। खाना न मिलने से यह गाय सड़कों पर तड़पती फिरती हैं। ऐसी दशा में अकसर दूषित सामग्री तक खाना शुरू कर देती हैं। यूपी सरकार ने वर्ष 2017 में इनके लिए
गो-आश्रय स्थल बनवाने का एलान किया लेकिन करीब तीन साल बीत जाने के बावजूद ये गो-आश्रय स्थल इनको सहारा देने लायक नहीं बन सके। झांसी में कुल 226 गो-आश्रय स्थल बनवाए गए, जिनमें 173 ग्रामीण इलाकों में जबकि शेष शहरी क्षेत्र में बनवाए गए। लेकिन, सौ से अधिक आश्रय स्थल ऐसे हैं जहां स्थायी छत नहीं है। अधिकांश पूरी तरह खुले हैं जबकि कुछ में तिरपाल, छप्पर आदि की अस्थायी व्यवस्था की गई है। शेड न होने से पानी के बीच ही गोवंशीय जानवरों को रहना
पड़ता है जबकि गाय बारिश से काफी बचने की कोशिश करती हैं। गाय को सूखा स्थान ही अधिक पंसद आता है लेकिन, अधिकांश गो-आश्रय स्थल की जमीन भी समतल नहीं है। बारिश होने पर यहां पानी से कीचड़ हो जाता है। चिरगांव, बंगरा, नोटा, बिजना, सिलोरी, मोंठ आदि इलाकों के गो-आश्रय स्थलों की काफी बुरी दशा है। रखरखाव न होने से अकसर गाय बीमार पड़कर दम भी तोड़ देती हैं लेकिन, सरकारी अमले को कोई फर्क नहीं पड़ता।
महज तीस रुपये की मिलती है खुराक
गो-आश्रय स्थलों में रखे गए प्रति गोवंश पर सरकार करीब तीस रुपये प्रतिदिन के हिसाब से खुराक का पैसा देती है जबकि उसके वजन के लिहाज से यह रकम काफी कम है। पशुधन चिकित्सकों के मुताबिक एक गोवंश पर रोजाना करीब सवा सौ रुपये का खर्च है। पर्याप्त खुराक न होने से अधिकांश गो-आश्रय स्थलों पर गोवंश भूखे ही पड़े रहते हैं। खुराकी पर्याप्त न होने की वजह से कई जगहों पर इन जानवरों को गांव में हांक दिया जाता है।
चोरी-छिपे आश्रय स्थलों से हांक दिए जाते हैं गोवंश
गोआश्रय स्थलों के रजिस्टर में क्षमता के मुताबिक गोवंशीय तो दर्ज किए जाते हैं लेकिन, तमाम संचालक चोरी-छिपे इन जानवरों को गांव में ही हांक देते हैं। इसी वजह से सैकड़ों की संख्या में गोआश्रय संचालित होने के बावजूद बुंदेलखंड में अन्ना जानवरों की संख्या में कमी नहीं हो रही। तमाम ग्रामीणों ने आला अफसरों तक भी यह शिकायत पहुंचाई लेकिन, अफसरों ने भी इसे गंभीरता से नहीं लिया।
बजट के मुताबिक गो-आश्रय स्थलों में व्यवस्थाएं की जाती हैं। भूसे के लिए अलग से भूसा बैंक बनाया गया है। सभी गो-आश्रय स्थलों के लिए तीन करोड़ रुपये का भूसा मंगया गया। - डॉ. वाईके तोमर, अपर निदेशक पशुपालन