झांसी। धीरे धीरे करके एक महीना होने जा रहा है। डेली गांव में श्रमिकों की बस्ती का हर कमाऊ अपने घर में है। गेहूं कटाई से जो अनाज मिला उसे बेचकर इन लोगों ने घर की जरूरतों को पूरा किया। लेकिन अब इन सभी को आगे की चिंता सताने लगी है। सोमवार की दोपहर को जब हम इस बस्ती में पहुंचे तो सभी महिलाएं और पुरुष अपने घरों से बाहर आ गए। हमने जैसे ही कुछ जानकारियां करने के लिए डायरी निकाली तो इन्हें लगा कि शायद कोई सामाजिक संगठन के लोग हैं और परिवार के सदस्यों की संख्या जानकर उसी हिसाब से राशन पहुंचवाएंगे। अभी हमने शुरूआत भी नहीं की थी कि कहने लगे, साहब, सदाबरत नई चानें, मैनत और मजूरी करके दो रोटी हैं खानें। ऐसे कब तक ठाली रहेंगे। ऐसे तो शरीर भी बेकार हो जाएगा। डेली गांव में इस आदिवासियों की बस्ती में आपको राज मिस्त्री मिल जाएंगे। बेलदार हैं, हाथ ठेला खींचने वाले हैं, स्टोन क्रेशर पर काम करने वाले हैं। रिक्शा चला लेते हैं। ईंट भट्ठा मजदूर हैं। घरों पर भी साफ-सफाई का काम कर लेंगे।
इस बस्ती में रहने वाले परिवारों की संख्या-120
इस बस्ती की आबादी भी 600 से अधिक की है
इस बस्ती रहने वाली महिलाएं भी पुरुषों के साथ मजदूरी करती हैं
शांति बोली, सुबह ही निकल जाते थे मजदूरी करने
विजय की पत्नी शांति से जब बात की तो उसका कहना था कि इस बार गेहूं कटाई में समय कट गया। पचास किलो गेहूं कमा लिया था। दोनों पति-पत्नी ने गेहूं की कटाई की। गेहूं बेचकर ही रसोई का सामान जुटाया है। लेकिन अब राशन ज्यादा दिन का नहीं बचा है। लिहाजा अब काम मिल जाए तो फिर से मजदूरी शुरू हो। शांति ने बताया कि वह मजदूरी करके सारा दिन में 300 से 350 रुपये तक कमा लेती है। पति के साथ ही मजदूरी करती है।
पुनिया का तो अब दिन भी नहीं कट रहा
पुनिया भी सारा दिन मेहनत मजदूरी करती है। वह यहां झोपड़ी में अपने पति और बेटी के साथ रहती है। पुनिया ने बताया कि काम नहीं मिलने से दिक्कत तो है ही। मजदूर तो रोज कमाते हैं और रोज खाते हैं। लेकिन किसी के आगे हाथ फैैलाना भी तो ठीक नहीं लगता। अब कोई किसी की मदद भी भला कब तक कर सकता है। मजदूर को तो काम मिल जाए बस उसी में वह खुश रहता है। मजदूरी मिलने लगे तो सारे संकट खत्म।
मजदूर को घर बैठा देना ही सबसे बड़ी सजा
जयकुमार ने कहा कि किसी मजदूर को घर बैठा देना ही सबसे बड़ी सजा होती है। पचपन साल की उम्र हो गई लेकिन कभी काम से छुट्टी नहीं की। मगर अब धीरे धीरे एक महीना होने जा रहा है मगर काम ही शुरू नहीं हो पा रहा। ऐसे बैठे बैठे तो शरीर भी बेकार हो जाएगा। अब तो बस जल्दी से काम शुरू हो और मजदूरी मिले। क्योंकि लंबा समय बीत जाने के बाद घर में जो थोड़ा बहुत पैसा था वह भी अब खत्म होने लगा है।
ठलुआ हैं, अब तो नींद भी सही से नहीं आती
पुत्तीलाल भी बेलदारी करते हैं। पुत्तीलाल का कहना है कि सुबह ही घर से निकल जाते थे और शाम को वापस आते थे। शाम को खाना खाते ही नींद आ जाती थी। लेकिन अब तो नींद भी सही से नहीं आ रही। अब तो बस काम शुरू होने जा ही इंतजार है। पुत्तीलाल ने बताया कि उसने अपने परिवार के साथ गेहूं की कटाई का काम किया था। एक बोरा गेहूं कमा लिया था। इस गेहूं से ही घर का गुजारा चल गया। हम लोगों की जरूरतें कोई ज्यादा नहीं होतीं लिहाजा कम पैसे में ही खर्च चल जाता है।
मजदूरों के लिए तत्काल शुरू हो काम
झांसी। लाकडाउन के चलते मध्यप्रदेश व उत्तरप्रदेश को मिलाकर बुंदेलखंड क्षेत्र के करीब पच्चीस हजार मजदूर दाने दाने को मोहताज हो गए हैं। बाहर से अपने घर लौटे इन मजदूरों के सामने कोरोना से से बड़ा दो वक्त की रोटी का संकट है। दोनों प्रदेशों की सरकारों को तत्काल इनके लिए काम देना चाहिए। अन्यथा बुंदेलखंड में कोराना से मौतें भले ही न हो भुखमरी की भयावहता को संभालना मुश्किल हो जाएगा। तीन महीने के लिए दस किलो गेहूं देने से मजदूरों का परिवार नहीं चल सकता है। इसके लिए अलग से बुंदेलखंड पैकेज दिया जाना चाहिए। स्थायी रूप से पलायन रोकने के लिए नदी से तालाब और तालाब से कुओं को जोड़कर सिंचाई की समस्या का स्थायी समाधान किया जाना चाहिए।
बृजेंद्र सिंह राठौर
पूर्व वाणिज्य व परिवहन मंत्री मध्यप्रदेश
पुनिया सेतू खाकर पेट भर रहीं हैं
डेली गांव की मजदूरों की बस्ती में अपनी झोपड़ी में बैठे मजदूर।