झांसी। झारखंड के हजारी बाग निवासी द्वारिका पिछले करीब 15 साल से भिवंडी (महाराष्ट्र) में मजदूरी कर रहे थे। अब लॉकडाउन में काम बंद है और रोटी के भी लाले पड़े तो ट्रक में बैठकर घर को चल दिए। मजदूरों से भरे ट्रक में उनकी सांसें फूलीं, उन्हें उतारा गया। कुछ हिचकियां और बस...। एक कामगार की जिंदगी की डोर टूट गई। अब कौन जाने की द्वारिका आखिरी वक्त में क्या कहना चाहते थे। उस वक्त उनकी आंखों में किनके चेहरे कौंधे। उनकी हिचकियां किसी की यादों का इशारा थीं या प्राणों के देह छोड़ने का। कुल मिलाकर बृहस्पतिवार की शाम एक मजदूर की मौत की गवाह बन गई।
50 साल के द्वारिका भी कोरोना त्रासदी में दर्ज हो गए। द्वारिका टाइल्स लगाने का काम करते थे। चार महीने पहले वह अपने घर हजारी बाग गए थे। इसके बाद से महाराष्ट्र के भिवंडी में ही रह रहे थे। लॉकडाउन में जब काम बंद हुआ तो कई दफा घर जाने की कोशिश की लेकिन साधन नहीं मिला। खैर अब बुधवार की सुबह दूसरे मजदूरों को लेकर आ रहे ट्रक में द्वारिका सवार हो गए। 2000 रुपये का किराया तय हुआ था। इस ट्रक में मजदूर इस तरह बैठाये गए थे कि सांस लेना भी मुश्किल था। द्वारिका के साथ सफर कर रहे प्रदीप प्रसाद ने बताया कि 60 मजदूर थे। द्वारिका ने कई दफा चीख-चीखकर कहा कि उसे बहुत गर्मी लग रही है। बेचैनी हो रही है लेकिन किसी ने सुना नहीं। जब हल्ला मचा तो ड्राइवर ने ट्रक रोक लिया और द्वारिका को नीचे उतार दिया। द्वारिका की हालत देखकर प्रदीप भी झांसी में रक्सा बार्डर के पास उतर गया। यहां द्वारिका की हालत बिगड़ने लगी तो पास में मौजूद पुलिस को सूचना दी। पुलिस ने तत्काल एंबुलेंस को फोन किया लेकिन एंबुलेंस नहीं पहुंची। करीब आधा घंटे बाद एंबुलेंस आई लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। जल्दी घर पहुंचने की चाहत लेकर महाराष्ट्र से निकले द्वारिका झांसी में दम तोड़ गए।
पास में जो भी था वह घर पहुंचने के लिए बेच डाला
झांसी। सरकार भले ही लाख दावे कर रही है कि मजदूरों को उनके घरों तक पहुंचाया जा रहा है लेकिन हकीकत देखनी है तो सड़कों पर जुट रही मजदूरों की भीड़ को देखिए। झांसी में हर रास्ते पर मजबूर मजदूर दिख जाएंगे। महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, दिल्ली और हरियाणा से मजदूर अपना किराया लगाकर किसी तरह पहुंच रहे हैं। लोगों के पास जो भी था वह बेच डाला। हकीकत यह है कि अब इनके पास एक वक्त की रोटी के लिए भी कुछ रह नहीं गया है।