सर्दियों में खर्राटे को हल्के में न लें
झांसी। वैसे तो खर्राटे लेना सेहत के लिए अच्छा नहीं होता है, लेकिन सर्दियों में यह और भी खतरनाक हो जाता है। इस सीजन में प्रदूषण के कारण श्वांस नली तक ऑक्सीजन पहुंचने में दिक्कत होती है और सूजन आ जाती है। सांस अवरुद्ध रहने से खर्राटे आते हैं। 10 सेकेंड से ज्यादा तक सांस रुकी होने पर शरीर में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। इससे हार्टअटैक और ब्रेन अटैक भी हो सकता है।
खर्राटे जानलेवा हो सकते हैं, इसे ऑब्स्ट्रक्टिव स्लीप एप्निया कहते हैं। सोते समय अक्सर सांस लेने की प्रक्रिया कुछ पलों के लिए रुक जाती है। इसके बाद फिर शुरू हो जाती है। शोध के अनुसार यह बीमारी महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों में तीन गुना ज्यादा होती है। 30 से 60 साल तक के पुरुषों में लगभग साढ़े चार फीसदी और महिलाओं में दो फीसदी इस बीमारी से ग्रसित रहती हैं। सर्दियों में सीओपीडी अस्थमा, नाक की एलर्जी बढ़ जाती है। इससे ऑब्स्ट्रक्टिव स्लीप एप्निया दो गुना हो जाता है। इस वजह से हार्टअटैक और ब्रेन अटैक होने का खतरा हो सकता है।
ये हैं लक्षण
- सोते समय बीच-बीच में सांस नहीं आना।
- इतनी जोर से खर्राटे की अन्य लोगों की नींद में खलल पड़े।
- डिप्रेशन का शिकार होना, याददाश्त कमजोर होना, चिड़चिड़ापन।
- सोते हुए बीच-बीच में अचानक सांस न आना, जिससे व्यक्ति अक्सर नींद से उठ जाता है।
- दिनभर सुस्ती छाई रहना, जिससे व्यक्ति काम के दौरान टीवी देखते या वाहन चलाते हुए सो जाना।
इनको है जोखिम
- मोटापे से ग्रसित लोग जिनका बॉडी मास इंडेक्स 30 किलोग्राम प्रति वर्ग मीटर से कम हो।
- गर्दन मोटी होने से सांस मार्ग छोटा हो सकता है। यह स्थिति मोटापे का संकेत हो सकती है।
- पुरुषों के लिए गर्दन की माप 17 इंच और महिलाओं के लिए 16 इंच से अधिक नहीं होनी चाहिए।
- इस बीमारी की समस्या उन लोगों में दोगुनी हो जाती है, जिन्हें अक्सर रात में नाक बंद होने की समस्या होती है।
ये हैं जटिलताएं
- इस बीमारी में आक्सीजन के स्तर का खून में कमी हो जाने से व्यक्ति की सांस फूलती है।
- ब्लड प्रेशर का बढ़ना, ह्रदय की धड़कन रुक जाना।
- दिल का दौरा पढ़ने की संभावना बढ़ जाती है।
- स्ट्रोक होने का जोखिम रहता।
- मधुमेह की दवाओं का असर नहीं करना।
- नींद पूरी न होने से मानसिक रोग का खतरा बढ़ जाना।
सर्दियों में ऑब्स्ट्रक्टिव स्लीप एप्निया दोगुना हो जाता है। इस वजह से हार्टअटैक और ब्रेन अटैक होने का खतरा हो सकता है। इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए और चिकित्सीय परामर्श लेना चाहिए। पहले सामान्य दवाएं देकर अवरुद्ध श्वांस को ठीक करने का प्रयास किया जाता है। यदि फिर भी ठीक नहीं होता है, तो स्लीप स्टडी कराते हैं। - डॉ. मुधर्मय शास्त्री, चेस्ट रोग विभागाध्यक्ष, मेडिकल कॉलेज।