झांसी। बुंदेलखंड में पैदा होने वाले कठिया गेहूं को अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलाने की कवायद शुरू हो गई है। इसके लिए अब उसे जीआई टैग (भौगोलिक संकेतक) से लैस किया जाएगा। नॉबार्ड ने प्रस्ताव तैयार करके कंसल्टेंट की नियुक्ति कर दी है। जीआई टैग मिलने से कठिया गेहूं उत्पादकों को विश्व बाजार हासिल हो सकेगा।
कठिया गेहूं को बुंदेलखंड का खास कृषि उत्पाद माना जाता है। इसे पूरी तरह जैविक माना जाता है। इस नाते कठिया गेहूं से बना दलिया काफी लोकप्रिय भी है लेकिन, उपज कम होने से इसके उत्पादन में किसान अधिक दिलचस्पी नहीं लेते हैं। कम रकबे में ही इसकी बुवाई होती है लेकिन, सरकार ओडीओपी की तर्ज पर प्रत्येक जनपद के एक कृषि उत्पाद को भी बढ़ावा देने की दिशा में काम कर रही है। सरकार की मंशा है उत्पादन बढ़ाने के साथ उसकी बिक्री के लिए किसानों को अच्छा बाजार भी उपलब्ध कराया जाए। कठिया गेहूं के उत्पादन को देखते हुए झांसी जिले के लिए चुना गया है। सरकार इसकी बुवाई का रकबा बढ़ाने के साथ फूड प्रोसेसिंग में इसके इस्तेमाल को बढ़ावा देने जा रही है। बाजार आसानी से उपलब्ध हो सके, इसके लिए नॉबार्ड ने जीआई टैग दिलाने की कवायद शुरू कर दी है। नॉबार्ड अधिकारियों के मुताबिक जाने-माने विशेषज्ञ रजनीकांत को कंसल्टेंट के तौर पर नियुक्त किया गया है। एक सप्ताह के भीतर आवेदन समेत दूसरी प्रक्रियाएं भी आगे बढ़ाई जाएंगी।
किसी खास स्थान पर होने वाले उत्पादों के लिए जीआई टैग (भौगोलिक संकेतक) का इस्तेमाल होता है। जीआई टैग सिर्फ उन्हीं उत्पादों को मिलता है, जिनका उत्पादन न सिर्फ स्थान विशेष में होता है, बल्कि गुणवत्ता भी सर्वोत्तम होती है। इसके हासिल होने से विश्व व्यापार की राह खुलेगी। अभी देश में दार्जिलिंग टी, महाबालेश्वर स्ट्रॉबेरी, बनारसी साड़ी, तिरूपति के लड्डू झाबुआ का कड़कनाथ मुर्गा, नागपुर का संतरा और कश्मीर के पश्मीना ऊन को जीआई टैग हासिल हो चुका है।
इसके लिए कवायद शुरू कर दी गई है। जीआई टैग मिलने से सीधे कठिया गेहूं उत्पादकों को लाभ मिलेगा। खाद्य प्रसंस्करण के तौर पर इसमें संभावना तलाशी जा रही। व्यापार में भी बढ़ावा मिलेगा
- भूपेश पाल
सहायक महाप्रबंधक, नॉबार्ड