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काश बाबा गंगादास झांसी की रानी के सैनिकों की बात मान जाते तो तलवार आज झांसी में होती

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काश बाबा गंगादास झांसी की रानी के सैनिकों की बात मान जाते तो तलवार आज झांसी में होती
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झांसी। अगर ग्वालियर में बाबा गंगा दास झांसी की रानी के विश्वस्त सैनिकों की बात मान लेते तो शायद 1857 के युद्ध में जौहर दिखाने वाली महारानी की तलवार आज झांसी में ही होती। पर, महारानी की चिता के सामने नत मस्तक होकर सैल्यूट दे रहे अंग्रेज जनरल ह्यूरोज को देखकर बाबा गंगा दास कुछ देर के लिए भावुक हो गए तथा उन्होंने अंग्रेज अफसर की बात मानकर रानी के शस्त्र उन्हें सौंप दिए। अब आजाद भारत में इस तलवार को झांसी लाने का एक मात्र रास्ता सिर्फ अदालत की शरण ही है।
ग्वालियर चंबल क्षेत्र के इतिहासकार डा. राम निवास शर्मा की पुस्तक वीरता की देवी में इस घटना जिक्र किया गया है। उन्होंने लिखा है कि प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की दीपशिखा महारानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजी सेना से लोहा लेते हुए ग्वालियर के रामबाग से होकर स्वर्ण रेखा नदी की ओर बढ़ रहीं थीं, पर उनके शरीर पर युद्ध के दौरान इतने जख्म हो चुके थे कि वे इस लड़ाई को आगे बढ़ाने में काफी कठिनाई महसूस कर रहीं थी। इसी दौरान उनका नया घोड़ा स्वर्ण रेखा नदी में अड़ गया। दोनों ओर से अंग्रेजी सैनिकों की टुकड़ियां उन पर ताबड़तोड़ हमले कर रहीं थीं, महारानी ने शहीद होने से पहले अपनी विश्वस्त पठान सेना के सिपाहियों से कहा कि प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की इस ज्योति को जलाए रखना और मेरी मृत देह को अंग्रेजी सिपाही स्पर्श न कर सकें यहीं मेरी अंतिम इच्छा है। बाबा गंगादास की कुटी के पास झांसी की रानी का अंतिम संस्कार कर दिया गया। भनक लगने पर अंग्रेजी जनरल ह्यूरोज अपने सैनिकों के साथ चिता स्थल पर पहुंच गया पर झांसी की रानी की वीरता के आगे वह नतमस्तक था। उसने महारानी को सैल्यूट किया तथा उसने बाबा गंगा दास से महारानी के वे शस्त्र मांगे जो बाबा की कुटिया में रखे थे। ह्यूरोज ने बाबा को आश्वासन दिया वह इन्हें भारत से बाहर नहीं ले जाएगा, बल्कि अपने मित्र सिंधिया के पास सुरक्षित रख देगा। बाबा गंगादास ह्यूरोज के महारानी के प्रति आदर को देखकर भावुक हो गए तथा ढाल और तलवार लेने के लिए कुटिया की ओर बढ़े । कुटिया के पास ही छुपे झांसी की सेना के सैनिकों ने बाबा से कहा यह हमारी महारानी की वीरता की अंतिम निशानी है, इसे मत दीजिए पर भावनाओं में बह चुके बाबा ने महारानी के शौर्य चिह्न ह्यूरोज को दे दिए।
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देश आजाद हुआ, महारानी की वीरता की कहानियों आजाद भारत में चारों ओर गूंजी पर झांसी वासी उनकी वीरता के साक्षी अस्त्र-शस्त्रों को ग्वालियर से झांसी नहीं ला पाए। इसके लिए सत्येंद्रपाल सिंह ने आंदोलन चलाया। इसके पहले पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रदीप जैन आदित्य ने भी तलवार को झांसी लाने की मुहिम चलाई, पर तलवार झांसी नहीं लाई जा सकी। बाईसा की तलवार को झांसी लाने की मुहिम में जुड़े लोगों से अमर उजाला ने बातचीत की है कि आखिर कौन सी अड़चन है जिससे महारानी के अस्त्र-शस्त्र झांसी नहीं आ पा रहे हैं।
संग्रहालय की संपत्ति को किसी दूसरी जगह ले जाने का अधिकार किसी को नहीं होता है। इसके लिए सिर्फ सुप्रीम कोर्ट ही आदेश कर सकता है। कोर्ट के आदेश के बाद भी यह नियम है कि जो भी वस्तु म्यूजियम से उठाई जाएगी उसके एवज में उसकी प्रतिकृति रखना होगी। इसके लिए सरकार को पहल करके आदेश करवाना होगा तभी महारानी की तलवार झांसी आ सकेगी।
मुकुंद मेहरोत्रा, इतिहासकार
हमने इस आंदोलन को लंबे समय तक चलाया। पर, हर बार इसकी फाइल मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के पास अटक कर रह गई। अगर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ एमपी के सीएम को पत्र लिखें तो निश्चित ही तलवार झांसी आ सकती है। हमने कुछ समय के लिए एमपी में आई कांग्रेस सरकार में भी कमलनाथ के सामने इस मुद्दे को उठाया पर तब तक सरकार चली गई। हमने सत्येंद्र पाल सिंह के आंदोलन में भी पूरा सहयोग किया तथा आगे इस मुद्दे को लेकर प्रयास करते रहेंगे। प्रदीप जैन आदित्य, पूर्व केंद्रीय मंत्री
इस मुद्दे को लेकर केंद्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल से बात की थी, उन्होंने कहा कि सरकार की ओर से कोई प्रस्ताव हमारे पास आएगा तो निश्चित ही तलवार को ग्वालियर से झांसी के लिए स्थानांतरित करने की पहल की जाएगी। हरगोविंद कुशवाहा, उपाध्यक्ष राष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान
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मनमोहन सरकार के समय केंद्रीय संस्कृति मंत्री ने झांसी में ही आश्वासन दिया था कि रानी से जुड़े सारे स्मृति चिह्न झांसी लाए जाएंगे, पर झांसी के जनप्रतिनिधि ग्वालियर के पूर्व महाराज सिंधिया के खौफ के कारण लोकसभा और राज्य सभा में कभी इस मुद्दे को नहीं उठा सके, इस कारण यह तलवार झांसी नहीं आ सकी। पर, हमारा आंदोलन सतत रूप से जारी रहेगा। सत्येंद्र पाल सिंह, अध्यक्ष बुंदेलखंड क्रांति मोर्चा
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