झांसी। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की अमर दीपशिखा वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई के क्रांतिपथ प्रोजेक्ट को भले ही केंद्र सरकार ने मंजूरी दे दी हो, लेकिन यह प्रोजेक्ट चुनाव के शोरशराबे में गुम हो गया है। इसे बनाने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया है। धनराशि भी आवंटित नहीं हुई है। 19 करोड़ के इस प्रोजेक्ट में झांसी का किला, गणेश मंदिर, बरुआसागर, तालबेहट, बालाबेहट के किला में पर्यटन विकास कार्य होने हैं।
रानी लक्ष्मीबाई के संघर्ष से जुडे़ स्थलों को विश्व व्यापी पहचान मिले। इसके लिए क्षेत्रीय सांसद उमा भारती की पहल पर वर्ष 2015 में पुरातत्व, पर्यटन, राजकीय निर्माण निगम सहित कई अन्य सरकारी संस्थाओं ने संयुक्त रूप से 200 करोड़ रुपये से अधिक का प्रोजेक्ट तैयार किया था। इसमें झांसी, ललितपुर के अलावा जालौन, मध्य प्रदेश का दतिया, भिंड और ग्वालियर भी शामिल था। लेकिन भारी भरकम धनराशि के कारण इसे केंद्र सरकार द्वारा मंजूर नहीं किया गया, जिसके बाद दो बार फिर इस प्रोजेक्ट को तैयार किया गया, लेकिन इसे मंजूरी नहीं मिली। इसके साथ ही नए प्रोजेक्टों में से मध्य प्रदेश के जिले और जालौन को हटा दिया गया।
नई पर्यटन नीति के अंतर्गत क्रांतिपथ को स्वदेश दर्शन में शामिल कर लिया गया। इसके बाद वर्ष 2018 में जुलाई अगस्त में 19 करोड़ रुपये का नया प्रोजेक्ट बनाया गया, जो पर्यटन मंत्रालय में मंजूरी के लिए भेजा गया। इसके बाद सितंबर 2018 में इस नए प्रोजेक्ट को मंजूरी भी दे दी गई थी। केंद्र के वित्तीय अधिकारियों ने प्रोजेक्ट में शामिल सभी पर्यटन स्थलों का गोपनीय औपचारिक भ्रमण भी किया था। संभावना थी कि नवंबर में धनराशि आवंटित हो जाएगी, लेकिन इसके बाद चुनावी शोरशराबे में फाइल ठंडे बस्ते में चली गई। इस संबंध में पर्यटन विभाग के उपनिदेशक आरके रावत से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन वह नहीं हो सका।
ये होने हैं काम
प्रोजेक्ट में झांसी और बरुआसागर के किले के साथ ललितपुर के दो किले भी शामिल किए गए थे। पर्यटन विभाग के अनुसार कार्यदायी संस्था राजकीय निर्माण निगम इन स्मारकों में जीर्णोद्धार का कार्य तो करेगी, इसके अलावा सैलानियों को बैठने के लिए बैंच, संपर्क मार्ग का निर्माण तथा स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था भी करनी है।
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नए प्रोजेक्ट में नहीं है रानी का असल क्रांतिपथ
क्रांति पथ का असल उद्देश्य रानी लक्ष्मीबाई के संघर्ष स्थल को पहचान दिलाना था। इसके लिए पुरातत्व विभाग ने वर्ष 2015 में पुरातत्वविद्, इतिहासकारों की संयुक्त बैठक भी कराई थी। इसमें काफी मंथन के बाद रानी लक्ष्मीबाई के किले से निकलने, उनके जगह-जगह रुकने, अंग्रेजों से हुए युद्ध के बाद ग्वालियर तक पहुंचने के स्थल चिह्नित किए गए थे। इनमें भांडेरी गेट, ग्वालियर में स्वर्ण रेखा नदी, रानी की समाधि आदि प्रमुख हैं। बाकायदा मानचित्र भी बना था लेकिन इसे नए प्रोजेक्ट में दरकिनार कर दिया गया।