श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण शुरू होने के साथ रामनगरी अयोध्या के पौने दो सौ जर्जर पौराणिक मंदिरों के जीर्णोद्धार की तैयारी भी कर ली गई है। प्राचीन मंदिरों के कायाकल्प के साथ ही अयोध्या के निवासियों को ओरछा की महारानी वृृषभानु कुंवरि की स्मृति ताजा हो जाना सहज बात है। अठारहवी सदी में ओरछा की महारानी ने अयोध्या में भव्य कनक भवन मंदिर का निर्माण कराया था। यह मंदिर ओरछा के रामराजा मंदिर की हूबहू प्रतिकृति है। जब लोग ओरछा के मंदिर में होते हैं तो अंदर व बाहर से उन्हें ऐसा अहसास होता है कि वह अयोध्या के कनक भवन मंदिर में है और अयोध्या के कनक भवन के अंदर ऐसा भ्रम होता है कि वे ओरछा में हैं। इन मंदिरों के पूजा मंडप से लेकर दालानें तक बिलकुल एक जैसी बनाई गईं हैं।
अयोध्या स्थित कनक भवन मंदिर को लेकर कई धार्मिक कथाएं हैं, कहा जाता है कि महाराज विक्रमादित्य द्वारा बनवाया गया विशाल कनक भवन एक हजार वर्ष तक ज्यों का त्यों बना रहा। बीच-बीच में उसकी मरम्मत होती रही। इसके जीर्णोद्धार के बाद दूसरी सहस्त्राब्दि में अयोध्या पर अनेक बार यवनों का आक्रमण हुआ, इसमें लगभग सभी प्रमुख देव स्थल क्षतिग्रस्त किए गए तथा कनक भवन भी तोड़कर जमींदोज कर दिया गया। 1891 में श्रीराम की अनन्य भक्त ओरछा की महारानी वृषभानु कुंवरि ने इस मंदिर का फिर से निर्माण कराया था। ओरछा के महाराज सवाई महेंद्र प्रताप सिंह जूदेव की धर्मपत्नी महारानी वृषभानु कुंवरि भगवान श्रीराम की अनन्य भक्त थीं। उन्होंने अयोध्या के कनक भवन में सीता-राम विग्रह की पूर्ण विधि-विधान से प्रतिष्ठा कराई थी। ओरछा और अयोध्या का काफी पुराना नाता है। यहां की महारानी वृषभानु कुंवरि ने कनक भवन मंदिर का निर्माण करवाया था तो वहीं महारानी कुंवरि गणेश रामजी के विग्रह को अयोध्या से ओरछा लाईं थीं।
बृषभानु कुंवरि को जाता है कनक भवन मंदिर के निर्माण का श्रेय
अयोध्या के कनक भवन मंदिर के निर्माण और इसे व्यवस्थित रूप देने का श्रेय ओरछा की रानी वृषभानु कुंवरि को जाता है। यह मंदिर रानी ने 1891 में बनवाया था। एक लंबे समय तक मंदिर की सेवा पूजा व व्यवस्था के लिए ओरछा राजघराने से ही धनराशि भी दी जाती रही। मंदिर में अब भी ओरछा राजघराने की महारानी का शिलालेख लगा है।
पं. राकेश अयाची भागवत कथा वाचक
रानी कुंवर गणेश लाईं थीं अयोध्या से ओरछा रामजी के विग्रह को कनक भवन मंदिर के निर्माण से पहले सोलहवी शताब्दी में ओरछा की ही एक और महारानी कुंवरि गणेश अयोध्या से रामराजा सरकार के विग्रह को ओरछा लाईं थीं तथा यहां पर राजा के रूप में विराजमान कराया था। इसके बाद से ही रामराजा को राजा के रूप में चार पहर की आरती में सशस्त्र सलामी दी जाती है।
-घनश्याम वाथम पुरातत्व अधिकारी