झांसी। खराब आर्थिक स्थिति का दंश झेल रहे बुंदेेलखंड के किसान अब कैमोमिल (गुलेबबुना फूल की खेती) की खेती में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। वे एक एकड़ में दस से बारह हजार की लागत लगाकर 45 से पचास हजार तक का मुनाफा कमा रहे हैं। जनपद के बारह गांवों के कई किसान कैमोमिल की खेती कर रहे हैं।
बुंदेलखंड की कंकरीली पथरीली जमीन पर हाड़ तोड़ मेहनत के बाद भी किसानों को सही फल नहीं मिल पाता है। इसे देखते हुए सरकार यहां नए-नए प्रयोग कर रही है। औषधीय खेती को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। इसमें कैमोमिल की खेती भी किसानों के लिए फायदे का सौदा साबित हो रही है। जिले के चार ब्लॉकों के लगभग 12 गांवों में पचास बीघा से अधिक रकबे में कैमोमिल की खेती की जा रही है। खास बात यह है कि यह फसल कम लागत और कम पानी में होती है।
कैमोमिल के बारे में जानिये
कैमोमिल एक विशेष प्रकार का फूल है, जिसका उपयोग विभिन्न सौंदर्य उत्पादों सहित निमभन रक्तचाप, कोलेस्ट्रोल कम करने, पेट संबंधी बीमारियों को ठीक करने में मदद करता है। इसकी बनी चाय से मुंह की दुर्गंध, दांत दर्द जैसे विकार दूर होते हैं।
इन गांवों में हो रही खेती
जिले के बंगरा, बड़ागांव, मऊरानीपुर और गुरसराय ब्लॉक के तेजपुरा, सनौरा, कदौरा, पठा करका, खिसनी खुर्द, खिसनी बुजुर्ग, कदौरा, टोड़ीफतेहपुर, घुघुवा के किसान इसकी खेती कर रहे हैं।
बुवाई का समय- अक्तूबर में इसके बीज की बुवाई कर इसकी रोपाई की जाती है।
किसानों को किया जागरूक
विशेषज्ञों ने किसानों को प्रशिक्षित किया और बेहतर उत्पादन के गुर सिखाए। इसका असर हुआ और किसान समूह बनाकर इसकी खेती कर रहे हैं। इसका प्रयोग विभिन्न उत्पादों में में होने के कारण विपणन में भी सहायता मिल रही है।
कैमोमिल की फसल मुख्य रूप से रबी की फसल है। विभिन्न सौंदर्य उत्पादों में प्रयोग होने के कारण बाजार में इसकी बेहद मांग है। इसमें पानी की खपत काफी कम होती है। बुंदेलखंड में पानी की कमी है। यहां के लिए कै मोमिल की खेती एकदम अनुकूल है। भैरम सिंह, उपनिदेशक उद्यान
प्रधानमंत्री कौशल विकास के तहत किसानों को प्रशिक्षित किया जा रहा है। साथ ही बाजार में मांग होने के कारण औषधीय फसलों की खरीद भी की जाती है। पुष्पेंद्र सिंह यादव
परंपरागत खेती की अपेक्षा इसमें लागत काफ ी कम लगती है और मुनाफा भी दोगुना मिल जाता है। 2017 में इसकी खेती एक बीघा में शुरू की थी अब दो एकड़ में कै मोमिल की खेती कर रहे हैं। राजेश कुशवाहा,
बुंदेलखंड के किसान पिछले कई वर्षों से अतिवृष्टि और सूखे की मार झेल रहा है। कैमोमिल की खेती पर मौसम की मार का प्रभाव नहीं पड़ता इस लिहाज से यह बेहद सुरक्षित है। नरेंद्र सिंह टोड़ीफतेहपुर
केवल तीन माह में उपज तैयार हो जाती है लागत भी कम लगती है और इसको बेचने पर तुरंत पैसा प्राप्त हो जाता है। पिछले दो वर्षो से इसकी खेती कर रहे है। सुम्मेेर सिंह कुशवाहा, खिसनी खुर्द
रासायनिक खादों के लगातार प्रयोग से यहां भी भूमि की उर्वरा शक्ति बहुत कम हो गई है। कैमोमिल की खेती में किसान के वल गोबर की खाद प्रयोग कर रहे हैं, जिससे जैविक खेती को बढ़ावा मिल रहा है। धर्मेंद्र सिंह