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हर साल कूड़े के नाम पर होता रहा करोड़ों का खेल, अधिकारी बचाते रहे

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झांसी। महानगर में कूड़े के नाम पर कूड़ा कलेक्शन कंपनियां निगम को हर साल करोड़ों रुपये का चूना लगाती रहीं। चार साल में कंपनियों ने महज 2.5 करोड़ ही निगम को जमा कराए। इसके बाद भी निगम के अधिकारी कंपनियों की कारगुजारी पर लगाम लगाने से बच रहे हैं। ऐसे में अधिकारियों की मंशा सवालों के घेरे में है। वहीं सदन की बैठक में पार्षदों ने मामले को उठाया, तो फिर से जांच का आश्वासन दे दिया गया। जबकि पार्षद पूरे तथ्यों और सबूतों के साथ जांच कराने की मांग कर रहे हैं।
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महानगर में नगर निगम ने कूड़ा कलेक्शन के लिए चार कंपनियों से अनुबंध किया था। आगरा में कंपनियों के खिलाफ एफआईआर हुई, तो झांसी में भी इन्हीं कंपनियों की कारगुजारी की जांच को लेकर सवाल किए गए। इस दौरान अधिकारियों ने जांच कराने की बात कहकर मामले को टाल दिया है। सदन की बैठक में शनिवार को मामला फिर से गूंजा तो कूड़ा कंपनियों की कारगुजारी की पोल खुली। नियमों के मुताबिक कंपनियों को हर साल निगम को यूजर चार्ज के एवज में करीब दो करोड़ रुपये देने थे, लेकिन कंपनियां वह भी नहीं कर सकीं। पार्षद जुगलकिशोर ने बताया कि कंपनियों को साल 2016-17 में यूजर चार्ज के हिसाब से करीब 2,02,23,456 रुपये जमा कराने थे, लेकिन 19,53,000 रुपये ही जमा कराए गए। साल 2017-18 में 2,65,47,696 में से 62,38,000 रुपये, साल 2018-19 में 2,91,36,000 में से 83,96,000 रुपये और साल 2019-20 में 2,91,36,000 रुपये में से महज 89,35,000 रुपये ही जमा कराए गए। उन्होंने बताया कि नगर निगम को चारों वित्तीय वर्ष में 7,95,21,152 रुपये का कुल नुकसान हुआ है। मगर निगम के अधिकारी कार्रवाई से बच रहे हैं। हालांकि निगम अधिकारियों का तर्क है कि 40 फीसद यूजर चार्ज का भुगतान कंपनियों को नहीं किया जा रहा है, लेकिन निगम 60 फीसदी का भुगतान तो कर रहा है। ऐसे में हर साल करोड़ों रुपये के खेल को अंजाम दिया जा रहा है। पार्षद महेश गौतम का कहना है कि कंपनियों का भुगतान रोकने और वसूली कराने की मांग की है। मगर निगम ने फिर से जांच का आश्वासन दे दिया।
अब मांगेंगे जवाब
निगम अधिकारियों ने कंपनी की जांच एक महीने में कराने का आश्वासन दिया है। इसके पीछे तर्क है कि कंपनियों से जवाब तलब किए बिना कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती। अगर यही कार्रवाई तीन महीने पहले शुरू हो गई होती, तो अब तक कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई हो सकती थी।
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काम से संतुष्ट नहीं, फिर भी बढ़ा दिया अनुबंध
कंपनियों से किए गए अनुबंध के मुताबिक कंपनियों के एक साल के कार्य से संतुष्ट होने पर ही अनुबंध को तीन साल बढ़ाया जा सकता था। पार्षदों का कहना है कि जब अधिकारी काम से संतुष्ट नहीं थे, फिर भी अनुबंध को तीन साल के लिए बढ़ा दिया गया।
निगम का तर्क, हम पर संसाधन नहीं
कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर निगम अधिकारियों का कहना है कि अगर कं पनियों का भुगतान रोक दिया जाता है, तो शहर से कूड़ा उठान बंद हो जाएगा। इसके बाद निगम के पास संसाधन नहीं हैं कि कूड़ा कलेक्शन कराया जा सके। निगम ने कभी इसके लिए वैकल्पिक प्रबंध किए नहीं थे।
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