झांसी। जंगल सिमट रहे हैं। पेड़ कटते जा रहे हैं। इसके बावजूद वनों की रक्षा लाठी, डंडों के भरोसे है। हथियार के नाम पर पूरी वन रेंज के लिए पुराने दौर की 315 बोर या 12 बोर की एक ही राइफल दी जा रही है। वन कर्मियों की कई बार बदमाशों से मुठभेड़ भी हो चुकी है। लेकिन आधुनिक हथियारों की कमी होने के कारण वन कर्मियों को कदम पीछे खींचने पड़े हैं। लेकिन विभाग द्वारा आज तक कोई भी अहम कदम नहीं उठाया गया है।
एक ओर पुलिस कर्मियों पर इंसास जैसी राइफलें हैं, यहां तक की होमगार्ड के जवान भी कंधों पर इंसास टांग कर ड्यूटी कर रहे हैं। लेकिन आज भी वन कर्मी पुराने दौर की 315 बोर और 12 बोर की राइफलों से जंगलों की रक्षा करने को मजबूर हैं। मंडल के झांसी में सात रेंज, ललितपुर में आठ रेंज व जालौन में आठ रेंज हैं। वनों की सुरक्षा के लिए विभाग द्वारा प्रत्येक रेंज में एक रेंजर, एक वन दरोगा व एक वन रक्षक को नियुक्त किया गया है।
पूरी रेंज की रक्षा के लिए सिर्फ एक ही पुराने दौर की राइफल दी गई है। रेंज का दायरा कम से कम 50 किलोमीटर का होता है। वन कर्मियों के पास हथियारों की कमी होने कारण वनों की सुरक्षा में आए दिन सेंध लग रही है। लेकिन विभाग के अधिकारी पूरी तरह से मौन हैं। इस संबंध में डीएफओ वीके मिश्रा ने बताया कि शासन स्तर की बैठकों में कई बार हथियारों की कमी को दूर करने की मांग की जा चुकी है। जल्द ही हथियारों की कमी को दूर कर दिया जाएगा।
कई बार मुठभेड़ में घायल हो चुके हैं वन कर्मी
माफियाओं द्वारा जंगलों के काटने की सूचना पर तुरंत ही मौके पर पहुंचकर इसे रोकने का प्रयास किया जाता है। लेकिन हथियारों की कमी होने के कारण वन कर्मियों की जान तक पर बन आती है। लगभग एक दशक के भीतर बीस से अधिक बार वन कर्मियों पर हमला हो चुका है। वर्ष 2008 में गुरसराय के भस्नेह में बदमाशों द्वारा पेड़ काटने की सूचना पर पहुंचे वन रक्षक पर फायरिंग कर दी गई थी। जिससे वन कर्मी शिवनाथ के पेट को छूती हुई गोली निकल गई थी। जिसमें वह बुरी तरह घायल हो गए थे। इसके अलावा भी कई वन कर्मियों पर हमले हो चुके हैं।