झांसी। 95 फीसदी मरीजों की अस्थमा की बीमारी इन्हेलर के सही इस्तेमाल से ही ठीक हो
जाती है। सिर्फ पांच प्रतिशत रोगियों को दवाएं चलानी पड़ती हैं। डॉक्टरों का कहना है कि
चूंकि, अधिकतर लोग इन्हेलर का सही से इस्तेमाल करना ही नहीं जानते हैं, इसलिए यह
बीमारी बढ़ जाती है।
मेडिकल कॉलेज के चेस्ट एवं टीबी रोग विभागाध्यक्ष डॉ. मधुर्मय शास्त्री ने बताया कि
अस्थमा आनुवंशिक बीमारी है। जिसमें श्वांस की नलियों में सूजन आ जाती है। सूजन के कारण
श्वांस की नलियां सिकुड़ जाती हैं, जिससे अस्थमा का अटैक पड़ता है। उन्होंने बताया कि
अस्थमा के मरीजों को धूल, धुआं, पराग कण, ठंडे पेय पदार्थ, फास्ट फूड के सेवन से बचना
चाहिए। इसके अलावा जब भी मौसम में बदलाव होना शुरू हो तो सतर्क रहें। कहा कि मरीजों
को इस बीमारी से डरने की जरूरत नहीं है। सही तरीके से यदि इन्हेलर का इस्तेमाल किया
जाए तो 95 फीसदी मरीज ठीक हो जाते हैं। पांच फीसदी रोगियों में दवा का प्रयोग करना
पड़ता है। उन्होंने बताया कि अधिकतर मरीजों को ये पता ही नहीं होता कि इन्हेलर का
इस्तेमाल कैसे करना है। विभाग के डॉ. राजकमल सिंह ने बताया कि मरीजों को सामने बैठाकर
इन्हेलर के उपयोग की विधि बताई जाती है।
हर साल 150 बच्चे होते शिकार
मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. ओमशंकर चौरसिया ने बताया कि हर साल
अस्थमा से पीड़ित 150 बच्चे अस्पताल में आते हैं। उन्होंने बताया कि औद्योगिकीकरण, धूल, धुआं
बढ़ने, कीटनाशक का इस्तेमाल करने से वातावरण में प्रदूषण बढ़ रहा है। ऐसे में बच्चों में भी
अस्थमा के केस बढ़ने लगे हैं। बच्चों में भी ये बीमारी ठीक हो जाती है। इन्हेलर का उपयोग
करने से तीन से छह महीने में बच्चा स्वस्थ हो जाता है।
ये हैं लक्षण
- लंबे समय से खांसी, सांस फूलना
- सीने में जकड़न जैसा महसूस होना
- सांस लेने में कठिनाई होना
- सांस लेते समय सीटी जैसी आवाज आना
- सुबह या रात में स्थिति गंभीर हो जाना
ये हैं कारण
- धूल, धुआं, प्रदूषित वातावरण, धूम्रपान
- ठंडे पेय और खाद्य पदार्थ
- बार-बार सर्दी, जुकाम वायरस व बैक्टीरिया का हमला
- पेड़, पौधों के परागकण, पालतू जानवर
- भावनात्मक बदलाव जैसे चिंता, गुस्सा, डिप्रेशन, चिड़चिड़ापन