झांसी विधानसभा क्षेत्र के मतदाताओं का मिजाज हवा के रुख के अनुकूल रहा है। कांग्रेस की लहर चली तो मतदाता कांग्रेस के साथ हो लिए और जब भारतीय जनता पार्टी की हवा चली तो मतदाताओं ने भाजपा का झंडा ऊंचा कर दिया। स्थिति यह है कि 1952 से अब तक हुए 18 विधानसभा चुनाव में सात बार कांग्रेस और छह बार भारतीय जनता पार्टी ने विजयश्री हासिल की। बीच - बीच में निर्दलीय, जनता पार्टी व अन्य दल के उम्मीदवारों पर भी जनता ने विश्वास किया, लेकिन समाजवादी पार्टी कभी नहीं जीती। इसलिए अबकी बार समाजवादी पार्टी मैदान में ही नहीं है।
आजादी के बाद जब अंतरिम सरकार बनाने के लिए 1947 में विधायकों का चुनाव हुआ तो कुंजबिहारी लाल शिवानी चुने गए। इसके बाद 1952 में हुए पहले आम चुनाव में कांग्रेस के आत्माराम गोविंद खेर जीते। उन्होंने 1957 में भी कांग्रेस का परचम फहराया, लेकिन 1957 में निर्दलीय लखपत राम शर्मा ने उन्हें हरा दिया। उसके बाद 1962 में भारतीय क्रांति दल के उदित नारायण शर्मा चुनाव जीते तो 1967 में निर्दलीय बाबू जगमोहन नाथ वर्मा ने विजयश्री हासिल की। करीब 17 वर्ष के बाद 1974 में बाबूलाल तिवारी ने सीट फिर से कांग्रेस की झोली में डाल दी।
लेकिन, 1977 में देश भर में लगे आपातकाल का झांसी की जनता ने भी विरोध किया। संयुक्त विपक्ष की ओर से जनता पार्टी की प्रत्याशी सूर्यमुखी शर्मा ने कांग्रेस के मेघराज सिंह कुशवाहा को हरा दिया। 1980 में भारतीय जनता पार्टी ने झांसी से जीत का खाता खोला और राजेंद्र अग्निहोत्री विजयी हो गए। उन्होंने कांग्रेस के मोहम्मद महमूद को 11 हजार से अधिक वोटों से हरा दिया, लेकिन उनकी यह लोकप्रियता अगले चुनाव में उनके साथ नहीं रही और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए चुनाव में मतदाताओं ने कांग्रेस का साथ दिया और ओमप्रकाश रिछारिया ने विजय हासिल की।
इस चुनाव के बाद कांग्रेस के प्रदर्शन में लगातार गिरावट आती गई और राम मंदिर आंदोलन की लहर पर सवार होकर भाजपा ने मतदाताओं पर अपनी पैठ बना ली। इसका नतीजा यह रहा कि 1989, 1991, 1993 और 1996 में लगातार चार बार जीत दर्ज कर भारतीय जनता पार्टी के रवींद्र शुक्ल ने इतिहास बना डाला। लेकिन, इसके बाद भाजपा की जीत का सिलसिला थम गया।
2002 में बहुजन समाज पार्टी ने कांग्रेस छोड़कर आए रमेश कुमार शर्मा पर दांव लगाया और भाजपा के रवींद्र शुक्ल को हराकर पहली बार बसपा विधायक बनने का गौरव पाया। पार्टी ने उन्हें मंत्री भी बनाया, लेकिन पार्टी में उनके मतभेद हो गए और उन्होंने विधानसभा एवं बसपा से इस्तीफा दे दिया। इस कारण 2004 में यहां की जनता को उपचुनाव का सामना करना पड़ा।
2004 में हुए उपचुनाव में झांसी की जनता ने कांग्रेस के युवा चेहरे प्रदीप जैन आदित्य को जिताकर लखनऊ भेज दिया। इस तरह उन्होंने करीब बीस साल के बाद फिर से कांग्रेस का परचम फहराया। 2007 के चुनाव में प्रदीप जैन आदित्य ने रिकार्ड मतों से विजय हासिल की। उन्होंने 65,552 वोट पाकर बसपा में वापस लौटे रमेश कुमार शर्मा को 33,796 वोटों से हराया। भाजपा से चार बार सांसद रहे राजेंद्र अग्निहोत्री की पत्नी सरोज अग्निहोत्री तीसरे स्थान पर रहीं। लेकिन, दो साल बाद हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से विधायक प्रदीप जैन आदित्य उम्मीदवार बने और चुनाव जीत गए, जिससे झांसी को एक बार फिर उपचुनाव का सामना करना पड़ा। इसमें बसपा के कैलाश साहू विजयी रहे थे। 2012 के चुनाव में भाजपा ने रवि शर्मा को चुनाव मैदान में उतारा और उन्होंने जीत हासिल की।
अबकी बार 2017 के चुनाव में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के गठबंधन के कारण झांसी विधानसभा सीट से कांग्रेस के प्रत्याशी राहुल राय, भारतीय जनता पार्टी से विधायक रवि शर्मा और बहुजन समाज पार्टी से सीताराम कुशवाहा चुनाव मैदान में हैं।