स्वतंत्रता संग्राम में उड़ीसा के चखी खुंटिया की कर्मभूमि रहा झांसी
सामजय नायक
झांसी। देश की आजादी के दीवानों के लिए झांसी हमेशा गढ़ रहा है। वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई, चंद्रशेखर आजाद सहित कई महान देशभक्तों की यह कर्मभूमि रही है। इन्हीं में से एक हैं जगन्नाथ पुरी मंदिर के पंडा एवं कवि चखी खुंटिया, जिन्हें चंदन हजूरी भी कहा जाता है। वह प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में रानी लक्ष्मीबाई के विशेष सहयोगी रहे।
स्वतंत्रता संग्राम में प्रतिभागी महान देश भक्तों की फेहरिस्त काफी लंबी है। इनमें कई ऐसे हैं, जिन्होंने अपनी अहम भूमिका निभाई। जन सामान्य में वह हमेशा सम्मानित और प्रिय रहे। इनमें शामिल उड़ीसा के जगन्नाथ पुरी में 1827 में जन्में चखी खुंटिया उड़िया भाषा के अलावा हिंदी में भी पारंगत थे। जगन्नाथ जी की पूजा के साथ ही वह अंग्रेजों की खिलाफत में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते रहे। मोरोपंत तांबे से नजदीकी होने के चलते वह देश भ्रमण करते हुए 24 मई 1857 को झांसी आए। अंग्रेजों की साम्राज्यवादी नीति पूरी तरह से हावी हो गई थी। रानी लक्ष्मीबाई ने उन्हें अपना सलाहकार बनाया और युद्ध की रणनीति बनाई। पुलिंद कला मंच के अध्यक्ष एवं झांसी के इतिहास के जानकार मुकुंद मेहरोत्रा ने बताया कि चखी खुंतिया ने कई राजाओं को रानी लक्ष्मीबाई का संदेशा भेजा। किले में उन्होंने अंग्रेजों से जोरदार सशस्त्र संघर्ष किया। युद्ध की समाप्ति के बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया गया था लेकिन वह जीवित थे और काव्य रचनाओं एवं साहित्य के द्वारा लोगों में देश की आजादी की चेतना जगाते रहे।
लिखी थी भोजपत्रों पर मनुबाई
रानी लक्ष्मीबाई की शौर्य गाथा को चखी खुंटिया ने भोजपत्रों पर लिखा था, जिसे नाम दिया गया था मनुबाई। जानकारी के अनुसार इसका रूपांतरण उड़ीसा सरकार ने जारी भी किया था लेकिन किसी कारण वश हटा दिया गया। हालांकि, आज भी उड़ीसा सरकार इनके नाम पर कार्यक्रम आयोजित करती है और पुरस्कार देती है।