जिले में ‘स्वस्थ नारी सशक्त परिवार’ पखवाड़ा चल रहा है लेकिन महिलाओं की चिकित्सा व्यवस्था पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। महिला जिला अस्पताल में दो साल से एनेस्थेटिक (निश्चेतक) नहीं है। ऐसे में वैकल्पिक व्यवस्था के तहत चिकित्सक की व्यवस्था करनी पड़ती है। हाल यह है कि निश्चेतक के आने तक भर्गवती महिलाएं बेहाल रहती हैं।
मोंठ से तीन-तीन दिन के लिए संबद्ध निश्चेतकों को आने में घंटों लगते हैं। निजी डॉक्टर भी अक्सर मिलते नहीं हैं। ऐसे में प्रसव पीड़ा से बेहाल गर्भवती को मेडिकल कॉलेज रैफर करना पड़ता है। खास ये दिन छुपने से अगले दिन सुबह तक या रविवार को चिंताजनक हाल में आने वाली गर्भवती महिलाओं को सीधे रेफर कर दिया जाता है। ये हाल तब है जब शासन स्तर के अधिकारी भी हकीकत जानते हैं।
जिला महिला अस्पताल की ओपीडी में रोजाना औसतन 380 महिलाएं आती हैं। यही नहीं, स्थायी निश्चेतक तैनात न होने के बावजूद एक माह में औसतन 50 महिला की सर्जरी और 250 से ज्यादा की सामान्य डिलीवरी होती है। ऑपरेशन की स्थिति में कभी मोंठ से संबद्ध डॉक्टर को बुलाया जाता है तो कभी इधर-उधर निजी डॉक्टरों को। डॉक्टर उपलब्ध न होने की स्थिति में मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया जाता है। मंगलवार सुबह प्रसव पीड़ा से बेहाल दो महिलाएं आईं। हालात काफी चिंताजनक थी और रेफर करना भी खतरनाक था। ऐसे में किसी तरह से निजी निश्चेतक को बुलाकर दोनों की सर्जरी कराई गई।
ऐसे तो कभी भी हो सकता है खतरा
अस्पताल सूत्रों के अनुसार, सीएमओ ने मोंठ सीएचसी से डॉ. केके जैन को बृहस्पतिवार, शुक्रवार व शनिवार और डॉ. शिव पूजन को सोमवार, मंगलवार व बुधवार के लिए महिला अस्पताल से संबद्ध कर रखा है। ये डॉक्टर सुबह आते हैं, फिर मोंठ वापस हो जाते हैं। देर शाम प्रसव पीड़ा से बेहाल महिला आती है तो परेशानी बढ़ जाती है।
महिला जिला अस्पताल के सीएमएस डॉ. राजनारायण ने बताया कि निश्चेतक की स्थायी तैनाती नहीं होने से अक्सर विकट स्थिति पैदा हो जाती है। मजबूरन गर्भवती को मेडिकल कॉलेज रेफर करना पड़ता है। महानिदेशक व स्थानीय अधिकारियों को हकीकत से कई बार अवगत करा दिया है।
सीएमओ डाॅ. सुधाकर पांडेय ने बताया कि चार-पांच निजी निश्चेतक का पैनल बनाने के लिए कह दिया गया है, जिन्हें एनएचएम से भुगतान होता है। शासन ने ब्यौरा मांगा है, जिसमें डिमांड भेज दी गई है। पूरी उम्मीद है कि जल्द महिला जिला अस्पताल में निश्चेतक की तैनाती होगी।