पूंछ (झांसी)। देश की आजादी के लिए जनपद के लोगों ने बढ़चढ़ कर योगदान दिया। इनमें से एक हैं पूंछ थाना क्षेत्र के मड़ोराखुर्द निवासी लक्ष्मीनारायण महाजन। अपने जीवन के सौ बसंत पार कर चुके स्वतंत्रता संग्राम सेनानी लक्ष्मीनारायण जब अंग्रेजों से लड़ाई के किस्से सुनाते हैं तो लोगों में देश के लिए कुछ करने की चाहत जाग उठती है। हालांकि अंग्रेजों का विरोध करने के लिए उन्हें जेल जाना पड़ा, यातनाएं सहनी पड़ीं। लेकिन, आजादी मिलने से वह खुद के प्रयासों को सफल देखकर गौरवान्वित होते हैं। लेकिन, वर्तमान में प्रशासन द्वारा ध्यान नहीं दिए जाने से उनका परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा है। उन्हें सरकार की योजनाओं का भी लाभ नहीं दिया गया है।
आजादी के लिए सब कुछ न्योछावर करने वाले ग्राम मड़ोराखुर्द निवासी लक्ष्मीनारायण महाजन अंग्रेजों के जमाने में आजादी के दीवानों को दी जाने वाली यातनाओं को जब विस्तार से बताते हैं तो सुनने वालों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। वह बताते हैं कि राजतंत्र अंग्रेजों का गुलाम था। ईस्ट इंडिया कंपनी के आदेश पर अंग्रेज क्रांतिकारियों को तरह-तरह की यातनाएं देते थे। जीवन के सौ वर्षपूरे कर चुके लक्ष्मीनारायण को आंख से कम दिखाई देता है और कानों से सुनाई भी कम देता है। वह चल फिर भी नहीं पाते हैं। वह बताते हैं कि वह दौर बिल्कुल अलग था। रियासतें अंग्रेजों के अधीन थीं। जब भी कोई आवाज उठाता था, तो उन्हें यातनाएं दी जाती थी। उन्हें भी अनेक बार राजा के सैनिकों द्वारा बंदी बनाकर रखा गया। 9 मई 1945 को धारा 129 के तहत उन्हें जेल भेजा गया और सात दिन का कारावास, चार सौ कोड़े तथा चार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई।
आज भी अंग्रेज सरकार द्वारा दी गयी यातनाओं से लक्ष्मीनारायण के पैरों में दर्द होता है। इस दर्द को दूर करने के लिए वह आग की गर्म राड से अपने पैरों जलाते हैं। उनका कहना है कि इस तरह से दर्द ठीक हो जाता है। लक्ष्मीनारायण के दो पुत्रपरशुराम एवं आत्माराम हैं। परशुराम ने बताया कि उनके पिता ने गांव के विकास के लिए पानी की टंकी एवं सड़क ठीक कराए जाने की मांग की थी, लेकिन अभी तक प्रशासन द्वारा कोई कदम नहीं उठाया। वह पानी की टंकी के निर्माण के लिए स्वयं की जमीन देने के लिए तैयार हैं। उनका परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा है। शासन द्वारा पेंशन के अलावा उन्हें आज तक कोई भी मदद नहीं दी गई। आत्माराम बताते हैं कि दो वर्ष पूर्व तत्कालीन जिलाधिकारी अनुराग यादव गांव आए थे। उस समय उनके पिता द्वारा गांव के विकास के लिए कुछ मांगे रखी थीं, लेकिन उन पर कोई विचार नहीं किया गया। स्वतंत्रता दिवस अथवा गणतंत्र दिवस जैसे मौकों पर ही उनके पिता लक्ष्मीनारायण को प्रशासन याद करता है, इसके बाद भूल जाता है।