झांसी। बुंदेलखंड के होली के रसिया, चौकड़िया व राई गीत जहां पूरे देश में जाने जाते हैं, वहीं फिल्मी होली गीतों में भी बुंदेलखंडी कनेक्शन जग जाहिर है। हम अगर कहें की लोककवि ईसुरीकी रसीली फागों के भावों को इंदीवर ने मुंबई की फिल्मी दुनिया तक पहुंचाया तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। हालांकि, इंदीवर की काव्य शैली व शब्द रचना एकदम अलग थी, पर श्रृंगार में नायिका का नखशिख वर्णन पूरी तरह से ईसुरी से ही प्रभावित था। झांसी जिले के बरुआसागर कसबे में जन्मे फिल्मी गीतकार इंदीवर के होली गीत पूरे देश में धूम मचाते रहे, इन गीतों में कहीं न कहीं बुंदेलखंड की माटी की महक आती है।
हम आपको उन होली गीतों से रुबरु कराएंगे, जो ईसुरी की नायिका रजऊ के लिए लिखी गईं श्रृंगार की फागों की चौकड़ियों से प्रेरित हैं। इंदीवर ने होली पर कई गीत लिखे हैं, पर 1982 में आई फिल्म कामचोर के गीत, मल दे गुलाल मोहे आई होली आई रे ने खूब धूम मचाई। राजेश रोशन के संगीत ने इंदीवर के गीत को मानो पंख लगा दिए। अस्सी के दशक में इस गीत के बिना होली पूरी ही नहीं होती थी। जब हम पीछे जाकर देखते है तो इस फिल्मी गीत का सीधा कनेक्शन ईसुरी की इस फाग से मिलता है, रजऊ खौ मलो कपोल गुलाल, लाली लाल कोपलन आगें फीको परौ गुलाल। इसी तरह 1970 में अंग अंग में अगन लगाती होली आई रे, इंदीवर का यह होली गीत भी खूब हिट हुआ था। इस गीत के बारे कहा जाता है कि इंदीवर ने यह गीत बुंदेलखंड के ही लोककवि ईुसरी की फाग गीतों की चौकड़ियों से प्रभावित होकर लिखा था। इंदीवर के इस गीत से पचास वर्ष पहले ही ईसुरी ने लिख दिया था, रजऊ के रंग में रंग गई फाग, रंग गुलाल रजऊ रंग देखो फाग में लग गई आग।
गीतकार इंदीवर के होली गीतों में न केवल बुंदेलखंड बल्कि झांसी और बरुआसागर की सांस्कृतिक खुशबू आती है। जहां तक लोककवि ईसुरी व इंदीवर की बात है तो दोनों ही झांसी की धरती के लाल हैं।
श्रीमती निशा राय
रंग दे गुलाल मोहे आई होली आई रे गीत निश्चित तौर पर पूरे देश में हिट हुआ था, यह बुंदेलखंड और खासकर बरुआसागर के लोगों के लिए गर्व का विषय है।
मुकेश अग्रवाल
रास रंग और श्रृंगार की जो भी झलक गीतकार इंदीवर में थी वह बुंदेली लोककवि ईसुरी से ही प्रेरित थी। उनके फिल्मी होली गीतों में इसकी झलक मिलती है।
भरत नामदेव