झांसी। साहित्य अकादमी, नई दिल्ली की उपाध्यक्ष और प्रसिद्ध साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा ने कहा कि आज वोटों के चक्कर में हिंदी, संस्कृत भाषा को राजनीतिक मुद्दा बनाया जा रहा है, जो कि गलत है। ऐसे मुद्दे विद्यार्थियों को दिग्भ्रमित करते हैं। साहित्य ही मनुष्य को मनुष्य बनाता है। उन्होंने यह बात ‘अमर उजाला’ से खास बातचीत में कही।
बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय संगोष्ठी में हिस्सा लेने आईं ‘सुधा स्मृति सम्मान’, ‘हिंदी अकादमी का साहित्य सम्मान’, ‘प्रेमचंद सम्मान’, ‘सरोजनी नायडू’ समेत कई पुरस्कारों से नवाजी जा चुकीं मैत्रेयी पुष्पा ने कहा कि मौजूदा समय में लोग यह सोचकर हिंदी छोड़ देते हैं कि इससे उन्हें कुछ मिलने वाला नहीं है। उन्होंने चुनौती देते हुए कहा कि कोई भी डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस भले ही क्यों न बन जाए लेकिन यदि साहित्य नहीं पढ़ता तो वह मनुष्य नहीं, सिर्फ अधिकारी बनता है। जीवन में वह न कुछ छोड़ के जाता है, न ही कुछ लेकर। साहित्य ही मनुष्य को मनुष्य बनाता है, जो कि जिंदगी की पहली जरूरत होती है।
वास्तविक साहित्य से युवा पीढ़ी के दूरी बनाने संबंधी सवाल पर उन्होंने कहा कि आज पढ़ाई भी सिर्फ कमाई के लिए हो रही है। साहित्य से कैसे युवा जुड़े, इस पर कहा कि दिल्ली में इसको लेकर उन्होंने प्रयोग किया है। दिल्ली के सभी विश्वविद्यालयों के छात्र-छात्राओं को कार्यक्रमों से जोड़ा गया, जिसमें शिक्षक, विद्यार्थियों को बुलाकर कई मुद्दे रखे गए। शिक्षक, विद्यार्थी के विचार लिए गए और साहित्य के संबंध में पढ़ने, पढ़ाने के तरीके देखे गए। इसके बाद शिक्षकों को बताया गया कि माता-पिता की तरह ही उनका बड़ा दायित्व होता है। इसलिए उबाऊ तरीके के बजाए नाटक, वाद विवाद प्रतियोगिता आदि के जरिए छात्रों को पढ़ाया जाए।
विभाग न होने पर ताज्जुब हुआ
बुंदेलखंड महाविद्यालय से हिंदी की शिक्षा प्राप्त मैत्रेयी पुष्पा ने कहा कि उन्हें यह सुनकर ताज्जुब हुआ कि बीयू में अब तक हिंदी विभाग नहीं है। उन्होंने कहा कि बीयू में हिंदी विभाग खुलने के बाद ऐसी योजना बनाई जानी चाहिए, जिससे विद्यार्थियों की रुचि राष्ट्रभाषा की ओर बढ़े।
राजनीतिक नहीं, व्यावसायिक कारणों से आगे बढ़ेगी भाषा
झांसी। साहित्य अकादमी के अध्यक्ष प्रो. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा कि भाषा राजनीतिक कारणों से नहीं, बल्कि व्यावसायिक व अन्य कारणों से आगे बढ़ेगी। कोई भाषा छोटी-बड़ी नहीं होती है। हिंदी को कभी राजनीतिक संरक्षण नहीं मिला। इतिहास की शक्ति के कारण हिंदी भाषा आगे बढ़ी है। बुंदेली साहित्य पर काम बहुत हुआ है। वह बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में हिस्सा लेने के बाद पत्रकारों से बात कर रहे थे।