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झांसी में तो रामभरोसे ही हैं स्वास्थ्य सेवाएं

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झांसी। प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर सोमवार को हाईकोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए मेडिकल सिस्टम को सुधारने के लिए चार महीने का वक्त दिया है। अगर झांसी की बात की जाए तो हालात यहां भी ठीक नहीं हैं। मेडिकल कॉलेज से लेकर जिला अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्रों पर डॉक्टरों और संसाधनों का अभाव है। कहीं मरीजों को बेड मुहैया नहीं हो पा रहा, तो कहीं दवा तक का इंतजाम नहीं। वहीं जिले के स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त करने के तमाम बड़े प्रोजेक्ट आज भी अधूरे हैं। शासन और प्रशासन स्वास्थ्य संसाधनों को लेकर बड़े-बड़े दावे भले करता हो, लेकिन लोगों के लिए बेहतर इलाज एक सपना ही है। कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर में जिले की स्वास्थ्य सेवाएं कांप गई थीं। अब जब तीसरी लहर आने को तैयार है और स्वास्थ्य सेवाएं लचर हैं। ऐसे कैसे संक्रमण से जंग लड़ी जा सकेगी।
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20 लाख की आबादी के लिए महज तीन हजार बेड
जिले में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जिले की 20 लाख की आबादी के लिए महज तीन हजार बेड हैं। जबकि महज 76 वेंटीलेटर हैं। इसके अलावा 110 प्राइवेट अस्पतालों में महज 1882 बेड और 33 वेंटीलेटर हैं। इसके अलावा रेलवे अस्पताल में 205 बेड, कैंट अस्पताल में 40 और मिलट्री अस्पताल में 150 बेड हैं।
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डाक्टरों की कमी बड़ा संकट
स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक जिले के मेडिकल कॉलेज, जिला अस्पताल और जिला महिला अस्पताल समेत 12 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और 32 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं। मेडिकल कॉलेज में 59, जिला अस्पताल में 19 डॉक्टरों के पद खाली हैं। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों के 88 पद सृजित हैं, लेकिन महज 45 ही काम कर रहे हैं। जबकि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर 33 में से 17 चिकित्सक ही कार्यरत हैं। इसके अलावा मेडिकल कॉलेज में तृतीय श्रेणी कर्मचारियों के 243, जिला अस्पताल में 10 और अन्य केंद्रों पर 29 पद रिक्त चल रहे हैं।
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ट्रामा सेंटर आज तक शुरू नहीं
मोंठ। मोंठ के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर पांच साल पहले पौने तीन करोड़ रुपये की लागत से ट्रौमा सेंटर बनाया गया था, लेकिन इसे आज तक शुरू नहीं किया जा सका। कई बार शासन स्तर के अधिकारियों ने इसका निरीक्षण किया, लेकिन कुछ नहीं हो सका। यहां पर स्त्री रोग विशेषज्ञ की तैनाती नहीं है। इससे गर्भवतियों को इलाज नहीं मिल पाता।
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बंगरा के स्वास्थ्य केंद्र फार्मासिस्टों के भरोसे
बंगरा। बंगरा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के अंतर्गत चार प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र आते हैं। लेकिन यहां भी स्वास्थ्य सेवाएं भगवान भरोसे हैं। चारों पीएचसी पर कोई भी सरकारी स्थाई डॉक्टर नहीं है। फ ार्मासिस्ट सभी केंद्रों को चला रहे हैं। बंगरा सीएचसी पर ही महज चार चिकित्सक हैं। 30 बेड वाले केंद्र पर इलाज की कोई सुविधा नहीं है। एक्सरे टेक्नीशियन है, लेकिन एक्सरे मशीन नहीं है। पानी की टंकी 10 साल से खराब पड़ी हैं।
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गरौठा में दो चिकित्सकों के हवाले स्वास्थ्य सेवा
गरौठा। गरौठा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर दो चिकित्सक, एक फार्मासिस्ट, एक स्टाफ नर्स के स्वास्थ्य सेवाओं को संभाल रही है। वहीं क्षेत्र के रमपुरा, सिमरधा, गुढ़ा, मारकुआं केंद्रों पर भी डॉक्टरों का अभाव है। लोगों को दवाएं तक नहीं मिल पा रही हैं।
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चिरगांव स्वास्थ्य केंद्र बना रेफर सेंटर
चिरगांव। दो साल पहले चिरगांव में बना सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र रेफर सेंटर बनकर रह गया है। यहां मरीज को उपचार देने के बजाय मेडिकल कॉलेज के लिए रेफर किया जाता है। यहां चिकित्सकों का खासा अभाव है। मौजूदा समय में वार्ड ब्वॉय और स्वीपर के सहारे अस्पताल चल रहा है। सीएचसी के अंतर्गत पांच प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर भी डॉक्टर नहीं हैं।
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गुरसराय में भी हाल बदहाल
गुरसराय। गुरसराय के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर ब्लॉक गुरसराय और बामौर के मरीज आते हैं, लेकिन यहां भी हाल बदहाल है। यहां पर छह पदों के सापेक्ष चार चिकित्सक कार्यरत हैं। मौजूदा समय में इनकी ड्यूटी भी झांसी में लगी हुई है। ऐसे में मरीजों को मायूस होकर लौटना पड़ रहा है।
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500 बेड का अस्पताल आज तक अधूरा
मेडिकल कॉलेज में साल 2012 में 500 बेड के अस्पताल की घोषणा की गई थी। 123 करोड़ रुपये की लागत से बना अस्पताल महज 70 करोड़ रुपये न मिलने से आज भी अधूरा है। महामारी के दौर में जहां लोगों को बेड नहीं मिल पा रहे हैं। वहीं अगर यह अस्पताल समय पर तैयार हो गया होता तो झांसी के मरीज बेड के लिए दर-दर न भटकते।
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कैंसर यूनिट भी छिन गई
महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज में साल 2016 में केंद्र सरकार ने टर्सरी केयर कैंसर सेंटर की स्वीकृति दी थी। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकार को मिलकर धनराशि खर्च करनी थी। शासन की ओर से फंडिंग के लिए केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा जाना था, लेकिन कुछ भी नहीं हो सका। पांच साल तक पत्र का इंतजार होता रहा और बाद में यह यूनिट भी हाथ से निकल गई।
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वर्जन
मंडल के साथ-साथ पूरे बुंदेलखंड में चिकित्सकों की कमी है। इस बारे में पिछले दिनों झांसी आए प्रमुख सचिव स्वास्थ्य को पत्र सौंपा था। पूरे मंडल में स्वास्थ्य सेवाओं के लिहाज से जो भी संसाधन हैं, उनसे काम चला रहे हैं। शासन से लगातार पत्राचार किया जा रहा है।
डॉ. अल्पना बरतरिया, अपर निदेशक स्वास्थ्य, झांसी मंडल
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जो स्टाफ उपलब्ध है, उसका कुशलता से प्रबंधन कर काम लिया जा रहा है। निजी चिकित्सकों को मदद के लिए आउटसोर्स पर तैनात किया गया है। जहां जैसी आवश्यकता पड़ी, वहां वैसे संसाधन मुहैया कराए गए हैं। स्वास्थ्य सेवाओं के सुधार के लिए शासन से भी लगातार बातचीत हो रही है।
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सुभाष चंद्र शर्मा, मंडलायुक्त, झांसी मंडल
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