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हमारा वोट तो सुरक्षा की गारंटी देने वाले को ही

Mon, 13 Feb 2017 12:37 AM IST
jhansi
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हमारा वोट तो सुरक्षा की गारंटी देने वाले को ही - फोटो : amar ujala
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विधानसभा चुनाव के मद्देनजर रविवार को ‘अमर उजाला संवाद’ का आयोजन किया गया, जिसमें महिलाओें ने बेबाकी से अपनी राय रखी। इस दौरान महिला सुरक्षा चर्चा का अहम मुद्दा रही। इसके अलावा आधी आबादी को तैंतीस फीसदी आरक्षण की वकालत भी की गई। महिलाओं ने तमाम स्थानीय समस्याएं भी उठाईं। साथ ही सभी ने एक सुर में कहा कि महिलाओं के प्रति संवेदनशील रवैया रखने वाले को ही प्रतिनिधित्व सौंपा जाना चाहिए। 
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ग्वालियर रोड औद्योगिक क्षेत्र स्थित अमर उजाला के कार्यालय में आयोजित कार्यक्रम में महिलाओं ने कहा कि देश के महानगर हों या छोटे कस्बे, महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। आए दिन छेड़खानी व बलात्कार की घटनाएं सामने आती रहती हैं। स्थिति यह है कि बेटी जब तक घर नहीं लौट आती है, तब तक मन में तमाम आशंकाएं बनी रहती हैं। यह माहौल बदलना चाहिए। महिलाओं के लिए रोजगार के अवसरों का भारी अभाव है। महिलाओं ने खराब सड़कें, गाड़ियोें की अनियंत्रित आवाजाही, लगातार महंगी होती शिक्षा, घरेलू हिंसा, स्वास्थ्य सेवाएं, आरक्षण जैसे मुद्दों पर भी अपने विचार रखे।  

दावे और वादों पर अमल नहीं 
राजनीतिक दल और नेता महिला सुरक्षा के दावे और वादे तो बड़े - बड़े करते हैं, लेकिन हकीकत में इन पर अमल नहीं होता है। शायद ही कोई ऐसा दिन होता हो, जब बलात्कार और छेड़खानी की घटनाएं समाचार की सुर्खियों में न रहती हों। इस पर अंकुश के प्रभावी उपाय नहीं किए जा रहे हैं। इसके लिए समाज के नजरिये में बदलाव के साथ - साथ कड़े कानून की भी आवश्यकता है।  
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- अपर्णा दुबे, महामंत्री - महिला व्यापार मंडल  

महिला सुरक्षा हो प्राथमिकता 
देश की आबादी में आधा हिस्सा होने के बावजूद महिलाएं उपेक्षित हैं। घर में वह घरेलू हिंसा का शिकार हैं, तो बाहर लोगों की नजरों से बचना मुश्किल होता है। लोग जरूर आधुनिक होते जा रहे हैं, परंतु सोच वही पुरानी है। यही वजह है कि सड़क पर हजारों की भीड़ में भी महिला खुद को अकेला महसूस करती है। यह स्थिति राष्ट्र के विकास का रोड़ा है। इसमें बदलाव होना चाहिए। 
- शालिनी साहू, गृहणी 

पुलिस का रवैया खराब 
जब कोई बलात्कार पीड़िता या छेड़खानी की शिकार महिला अपनी शिकायत लेकर पुलिस के पास पहुंचती है, तो पहले तो उसे ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। उसकी कपड़ों से लेकर चालचलन तक सवाल खड़े कर चलता करने का प्रयास किया जाता है। यही वजह है कि तमाम महिलाएं खुद पर होने वाले अत्याचारों पर चुप्पी साधे रहती हैं। महिलाओं को न्याय मिले, इसके लिए पुलिस की कार्यशैली में सुधार बेहद जरूरी है। 
- रजनी जैन, एडवोकेट 

वाहनों की स्पीड पर हो नियंत्रण 
राजनीतिक दलों के घोषणा पत्र में बड़े - बड़े मुद्दे तो रहते हैं, लेकिन लोगों की रोजमर्रा की समस्याओं को वह छूते भी नहीं हैं। इसी का नतीजा है कि लोग समस्याओं से जूझ रहे हैं। अब वाहनों की अनियंत्रित स्पीड बड़ी समस्या बनी हुई है। अठारह वर्ष से कम आयु के बच्चे भी हाई स्पीड बाइक पर फर्राटे भरते नजर आते हैं। यह स्थिति सड़क पर चलने वाले बच्चे व बुजुर्गों के लिए सबसे खतरनाक होती है। बावजूद, लगाम नहीं है। 
- डा. नीता शांडिल्य, प्रोफेसर - आर्य कन्या डिग्री कालेज  

खस्ताहाल सड़कें, ट्रैफिक बेकाबू 
विकास सरकारी भवनों में सिमट कर रह गया है, जिनके निर्माण पर सरकारें पानी की तरह पैसा बहा रही हैं। लेकिन, सड़कों की ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। यहां तक कि सड़क के गड्ढे तक नहीं भर पा रहे हैं। लोग गिरते - पड़ते अपना सफर तय करते हैं। यही हाल ट्रैफिक का भी है। यातायात नियंत्रण के उपाय इलाइट चौराहे पर ही सिमट कर रहे गए हैं। सुधार के लिए जनप्रतिनिधियों की ओर से भी पहल होती नहीं दिखी है।
- रेखा राठौर, संस्थापक - जेसीआई गूंज   

महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिले 
आबादी के अनुरूप महिलाओं को लोकसभा व विधानसभा में प्रतिनिधित्व नहीं मिलता है। राजनीतिक दल भी महिलाओं को नजरअंदाज कर देते हैं। महिलाओं को टिकट देने में कंजूसी दिखाते हैं, जबकि वोट लेने के मामले में नेता पूरी दरियादिली का परिचय देते हैं। इसी का नतीजा है कि सदन में महिलाओं से जुड़े मुद्दे सही ढंग से नहीं उठ पाते हैं और न ही आधी आबादी के हित में प्रभावी कानून बन पाते हैं। 
- सोहालिया खान, जेसीआई कोहिनूर 

 बच्चों की सुरक्षा के नहीं हैं इंतजाम 
बच्चों की सुरक्षा के इंतजाम नगण्य है। इसका अंदाजा स्कूली ऑटो को देखकर लगाया जा सकता है, जिनमें बच्चों को ठूंस - ठूंस कर बैठाया जाता है। और तो और सुरक्षा जाली तक नहीं लगाई जाती है। हां, कोई अप्रिय घटना होने के बाद जरूर कुछ दिनों तक नियमों की बात होने लगती है। लेकिन, कुछ ही दिनों बाद पुरानी स्थिति वापस लौट आती है। जबकि, यह बेहद गंभीर विषय है। इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए। 
- सीमा अग्रवाल, गृहणी 

 जनहित में लड़ें चुनाव 
नेता जनहित में नहीं, बल्कि स्वहित में चुनाव लड़ते हैं। समस्या यहीं से शुरू हो जाती है। चुनाव जीतने के बाद वह अपना हित सर्वोपरि रखते हैं, जबकि जनता हाशिये पर चली जाती है। यही वजह है कि उनका ध्यान आम जनमानस की समस्याओं की ओर नहीं रहता है। जबकि, जनप्रतिनिधि उसे ही चुना जाना चाहिए, जिसके लिए जनहित प्राथमिकता पर हो। अपने लिए जीने वाले नेता को प्रतिनिधित्व नहीं दिया जाना चाहिए।
- प्रगति शर्मा, पूर्व छात्रासंघ अध्यक्ष - आर्य कन्या महाविद्यालय  

सरकारी नियंत्रण में हो शिक्षा 
प्राइवेट स्कूल व्यवसाय के केंद्र बन गए हैं। शिक्षा लगातार महंगी होती जा रही है। स्कूलों की फीस मनमाने ढंग से बढ़ा दी जाती है। हर साल किताबें भी बदल दी जाती हैं। एक ओर सरकारें जहां मुफ्त शिक्षा की बातें कर रही हैं, वहीं पब्लिक स्कूल की पढ़ाई आम आदमी की पहूंच से दूर हो रही है। इस पर नियंत्रण जरूरी है। प्राइवेट स्कूलों की फीस और किताबें तय करने का अधिकार सरकार के पास होना चाहिए। 
- डा. नीलम आनंद 

स्थानीय घोषणापत्र जारी करें 
राजनीतिक दलों द्वारा जारी किए जाने वाले घोषणा पत्रों पर उनके प्रत्याशी चुनाव लड़ते हैं। इनमें प्रदेश व राष्ट्रीय स्तर के मुद्दे व समस्याएं तो होती हैं, परंतु स्थानीय स्तर की समस्याओं को छुआ भी नहीं जाता है। यही वजह है कि समस्याएं जस की तस बनी रहती हैं। जबकि, सभी दलों के प्रत्याशियों को अपना स्थानीय घोषणा पत्र भी जारी करना चाहिए, जिससे जनता उनका विजन समझ सके। 
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- ममता जैन, समाजसेवी 

इन मुद्दों पर भी चर्चा 
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- शादी-ब्याह जैसे कार्यक्रमों में न हो भोजन की बर्बादी 
- सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों में महिलाओं को प्राथमिकता दें 
- नशे पर किया जाए अंकुश का प्रबंध 
- शहर की सफाई व्यवस्था हो दुरुस्त 
- आरक्षण खत्म हो, सभी को मिले समान अधिकार 
-प्रत्याशी पसंद न हो, तो नोटा का इस्तेमाल करें 
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