झांसी। बच्चे की लंबाई न बढ़ने से परेशान माता-पिता ग्रोथ हार्मोन थेरेपी कराने पर छह से आठ लाख रुपये खर्च कर रहे हैं। ग्रोथ हार्मोन की कमी होने पर झांसी समेत बुंदेलखंड में कई बच्चे ये थेरेपी करा चुके हैं। डॉक्टरों का कहना है कि जितनी जल्दी बच्चे में ग्रोथ हार्मोन की कमी का पता चल जाता है और इलाज शुरू हो जाता है, ये थेरेपी उतनी कारगर साबित होती है। मेडिकल कॉलेज के बाल विभागाध्यक्ष डॉ. ओमशंकर चौरसिया ने बताया कि मेडिकल कॉलेज से हर साल आठ से 10 बच्चों को ग्रोथ हार्मोन थेरेपी के लिए रेफर किया जाता है। अभी कॉलेज में इसके इंजेक्शन उपलब्ध नहीं हैं। भविष्य में ये थेरेपी शुरू कराने का प्रयास किया जाएगा।
डॉक्टरों का कहना है कि जिस भोजन में कार्बोहाइड्रेट, फैट और प्रोटीन होता है, वही संतुलित डाइट होती है। दूसरी तरफ, कुछ बीमारियों के चलते भी बच्चों की लंबाई कम रह जाती है। इसमें ग्रोथ हार्मोन भी शामिल है। चार हजार बच्चों में से किसी एक में ग्रोथ हार्मोन की कमी हो सकती है। ऐसे बच्चों की लंबाई बढ़ाने के लिए ग्रोथ हार्मोन की जरूरत पड़ती है। पिछले हफ्ते ओरछा में आयोजित बाल रोग विशेषज्ञों के सम्मेलन में शामिल हुए मेरठ मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. विजय जायसवाल ने बताया कि वह हर महीने दो से तीन बच्चों की ग्रोथ हार्मोन थेरेपी करते हैं। इसमें अधिकतर बच्चे यूपी के होते हैं। थेरेपी से पहले ग्रोथ हार्मोन सिमुलेशन टेस्ट से पता करते हैं कि बच्चे में थेरेपी कितनी कारगर होगी।
उन्होंने बताया कि थेरेपी के दौरान बच्चे को इंजेक्शन लगाए जाते हैं। कम से कम तीन से चार साल तक ये इंजेक्शन चलते हैं, तब जाकर बच्चा औसत लंबाई तक पहुंच पाता है। थेरेपी के दौरान हर साल का खर्च दो लाख रुपये आता है। अभी प्रदेश में सिर्फ लखनऊ के पीजीआई, कानपुर और मेरठ मेडिकल कॉलेज में ही ये थेरेपी होती है। बताया कि जिन बच्चों का कद चार सेंटीमीटर से कम बढ़ रहा है तो जांच कराकर पता करना चाहिए कि कहीं बच्चे में ग्रोथ हार्मोन की कमी तो नहीं है। जिन बच्चों को जन्म के बाद दौरे आते हैं, तालू कटे होते हैं तो उनमें मल्टीपल पिट्यूटरी हार्मोन की कमी हो सकती है।
उधर, जानकारों के मुताबिक पिट्यूटरी ग्रंथि द्वारा बहुत कम मात्रा में ग्रोथ हार्मोन बनने के कारण लंबाई कम रहने की दिक्कत हो सकती है। इसके कई कारण हो सकते हैं। इसमें अनुवांशिक दोष, मस्तिष्क की गंभीर चोट या जन्म से ही पिट्यूटरी ग्रंथि न होना आदि शामिल है।
आठ इंच छोटी रह जाती है लंबाई
डॉ. विजय ने बताया कि भारत में लड़कों की औसत लंबाई 170 सेंटीमीटर (करीब 5.7 फीट) है। जबकि, लड़कियों की औसत लंबाई 157 सेंटीमीटर (करीब 5.2 फीट) है। हालांकि, माता-पिता की लंबाई के आधार पर ही बच्चों का कद बढ़ता है। वहीं, जिन बच्चों में ग्रोथ हार्मोन की कमी होती है, उनका कद सामान्य लंबाई से आठ इंच छोटा रह जाता है।
इन वजहों से कम हो जाते ग्रोथ हार्मोन
ये भी जानें
- जन्म के बाद बच्चे की लंबाई 50 सेंटीमीटर होती है।
- एक साल में शिशु 75 सेंटीमीटर का हो जाना चाहिए।
- दो साल में कद 87.5 सेंटीमीटर पहुंचनी चाहिए।
- इसके बाद बच्चा हर साल पांच से छह सेंटीमीटर बढ़ता है।
- पांच से दस साल तक हर साल पांच सेंटीमीटर लंबाई बढ़ती है।
केस-1
सिविल लाइन के सात साल के बालक की लंबाई सौ सेंटीमीटर से कम होने की वजह से परिजन उसे मेडिकल कॉलेज लेकर पहुंचे। जांच के बाद पता चला कि बच्चे में ग्रोथ हार्मोन की कमी है। फिर उसे थेरेपी के लिए रेफर कर दिया गया।
केस-2
सीपरी बाजार के छह वर्षीय बच्चे का कद 90 सेंटीमीटर ही बढ़ सका। परिजनों ने मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर को बताया कि सालाना लंबाई तीन सेंटीमीटर तक बढ़ती है। जांच में बच्चे में ग्रोथ हार्मोन की कमी मिली तो परिजनों ने लखनऊ में थेरेपी कराई।