कोरोना वायरस के संक्रमण के खात्मे की शुरुआत शनिवार को टीकाकरण अभियान के साथ होगी। ये महामारी तमाम लोगों को ऐसे गहरे जख्म दे गई है, जिनकी भरपाई उनके लिए जिंदगी भर संभव नहीं है। किसी ने अपने भाई को खाया तो कोरोना ने किसी के सिर से पिता का साया हमेशा के लिए उठा लिया। इन लोगों को भी टीके का बेसब्री से इंतजार था। उनका कहना है कि जो हमारे साथ हुआ, वो किसी और को न देखना पड़े, इसके लिए सभी मिलकर टीकाकरण अभियान को सफल बनाएं।
झांसी में कोरोना वायरस का पहला मरीज 27 अप्रैल 2020 को सामने आया था, जबकि कोरोना से पहली मौत पांच मई को हुई थी। 62 साल के एक बुजुर्ग को इस महामारी ने अपनी चपेट में ले लिया था। इसके बाद संक्रमितों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ मौत का आंकड़ा भी लगातार बढ़ता गया। बुजुर्गों और बीमारों के साथ-साथ युवाओं तक को इस महामारी ने अपनी चपेट में ले लिया। अब तक जिले में 174 संक्रमित इस महामारी से अपनी जान गवां चुके हैं। ये वो लोग हैं, जिनकी मौत झांसी में हुई थी। इसके अलावा ऐसे भी तमाम लोग हैं, जिन्होंने दिल्ली, गुरुग्राम, गाजियाबाद व अन्य शहरों में इलाज के दौरान दम तोड़ा।
पिछले नौ माह के दरम्यान ऐसे कई दर्दनाक मंजर देखने को मिले, जिन्हें सुनकर हर किसी की आंखें नम हो उठीं। भरापूरा परिवार होने के बाद बेगाने हाथों ने अंतिम संस्कार किया। यहां तक कि अंतिम संस्कार के लिए मजदूरों तक का सहारा लेना पड़ गया। इस दरम्यान किसी ने अपना बेटा खोया तो किसी ने पिता। लेकिन, टीकाकरण अभियान की शुरुआत होने से सभी राहत महसूस कर रहे हैं।
महज एक सप्ताह में ही हो गई थी भाई की मौत
झांसी। बड़ाबाजार गणेश मढ़िया निवासी कारोबारी मनोज सरावगी के भाई पंकज कुमार सरावगी (45) की कोरोना से 5 जुलाई को मृत्यु हो गई थी। मनोज सरावगी ने बताया कि उनका भाई सराफा कारोबारी था और पूरी तरह से स्वस्थ था। अचानक कोरोना की गिरफ्त में आ गया, जिसे अस्पताल में दाखिल कराया गया। महज एक सप्ताह के भीतर ही उसकी मौत हो गई थी। परिवार को संभालना मुश्किल हो गया था। आज भी मंजर याद कर रूह कांप जाती है। उन्होंने कहा कि कोरोना का टीका आने से तसल्ली है। जो उन्होंने खोया वो किसी और को न खोना पड़े, इसलिए सभी टीकाकरण अभियान के सहभागी बनें।
लंबे इलाज के बाद भी नहीं बच पाई मां
झांसी। पुरानी नझाई निवासी कारोबारी द्वारकेश गुप्ता की मां शशि गुप्ता (65) की 9 सितंबर को कोरोना से मौत हो गई थी। मृत्यु से पहले वह एक महीने तक लगातार इस महामारी से जूझती रहीं। दिल्ली में उनका इलाज चलता रहा। परिवार के सभी पुरुष सदस्य दिल्ली में ही टिके रहे। लेकिन, तमाम कोशिशों के बाद भी मां की जान नहीं बचा पाए। द्वारकेश ने बताया कि मां अस्पताल के भीतर दाखिल थीं और परिवार के लोग उनसे मिल भी नहीं पाते थे। जबकि, सभी एक झलक पाने तक को बेताब रहते थे। उन्होंने कहा कि वह कोरोना काल को कभी भुला नहीं सकते हैं। लेकिन, वैक्सीन आने से राहत है। अब किसी को अपनी मां नहीं गंवानी पड़ेगी।
अंतिम संस्कार के लिए बुलाने पड़े थे मजदूर
झांसी। कोरोना काल में पुराने शहर में एक बुजुर्ग की मौत हो गई थी। घर में उनका पुत्र अकेला था। जबकि, आसपास के मुहल्लों में तमाम रिश्तेदार रहते थे। लेकिन, कोरोना संक्रमित के अंतिम संस्कार के लिए कोई रिश्तेदार आगे नहीं आया। ऐसे में अकेला पुत्र लाचार हो गया। उसने पिता के अंतिम संस्कार के लिए चार मजदूर बुलाए और उन्हें पीपीई किट पहनाई। तब कहीं जाकर वह अपने पिता का अंतिम संस्कार कर सका। ये स्थिति तब बनी जब मरने वाले बुजुर्ग की कोरोना रिपोर्ट नहीं आई थी। लक्षणों के आधार पर लोगों ने दूरी बना ली थी। हालांकि, अंतिम संस्कार के बाद आई रिपोर्ट में बुजुर्ग संक्रमित पाया गया था।
तीन दिन के अंतराल में दो पुत्रों की उठी थी अर्थी
झांसी। महानगर की पॉश कॉलोनी में रहने वाले एक कारोबारी के नौजवान पुत्रों की अर्थी महज तीन दिन के अंतराल में उठी थी। दोनों पुत्र कारोबारी थे और कोरोना की गिरफ्त में आ गए थे। झांसी में शुरुआती उपचार के बाद कारोबारी उन्हें दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में ले गया था। लगभग पंद्रह दिनों तक चले इलाज में लाखों रुपये खर्च किए गए। लेकिन, जान नहीं बच पाई। पहले एक पुत्र की मौत हुई और उसके तीन दिन बाद दूसरे ने दम तोड़ दिया। इस घटना से पूरा महानगर शोक मग्न हो उठा था।