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अफसरों के सामने पति की मौत साबित नहीं कर पा रही गीता

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झांसी। पति की मौत पत्नी के जीवन का सबसे बड़ा सदमा है लेकिन, पत्थर जैसा सिस्टम ने पत्नी को अपने पति का मुत्यु प्रमाण पत्र बनवाने के लिए परेशान कर रखा है। पति की मौत की इबारत कागजों में दर्ज कराने को वह पिछले एक साल से आला अफसरों के चक्कर काटते-काटते थक गई। लेकिन कोई भी सुनवाई करने को राजी नहीं है।
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बरुआसागर के तारामन्ना, दानीपुर ग्राम पंचायत निवासी गज्जन (43) पत्नी गीता समेत पुत्री मधु, मनीषा एवं दो पुत्र मनीष और आर्यन के साथ सीपरी बाजार में रहता था। पिछले वर्ष जुलाई माह में गज्जन अचानक बीमार पड़ गया। पत्नी गीता उसे लेकर मेडिकल कॉलेज पहुंची लेकिन, कोविड काल के चलते डॉक्टरों ने गीता को लखनऊ ले जाकर इलाज कराने की सलाह दी। बकौल गीता डॉक्टरों की सलाह पर वह तैयार भी हो गई। लेकिन अस्पताल पहुंचने से पहले ही पति की मौत हो गई। अकेली पड़ चुकी गीता किसी तरह पति का शव लेकर गांव पहुंची। वहीं दाह संस्कार कर दिया गया। काफी दिनों तक वह सदमे में रही। जब पैसों की जरूरत महसूस हुई तब सरकारी योजनाओं में पति का मृत्यु प्रमाण पत्र मांगा जाने लगा। मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने वह नगर निगम पहुंची लेकिन, निगमकर्मियों ने गांव में अंतिम संस्कार होने का हवाला देते हुए बड़ागांव से मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने की बात कहते हुए टाल दिया। इसके बाद वह बड़ागांव विकास खंड पहुंची। यहां कर्मचारियों ने मेडिकल अस्पताल में मौत होने की बात कहते हुए हाथ खड़े कर दिए। कोई भी महकमा उसकी बात मानने को राजी नहीं है। पिछले एक साल से गीता लगातार नगर निगम और बड़ागांव ब्लॉक के अफसरों के बीच भटक रही है। जिलाधिकारी, सीडीओ, नगर आयुक्त से भी गुहार लगा चुकी है। लेकिन इन आला अफसरों से भी उसे मदद नहीं मिली। गज्जन परिवार का इकलौता कमाई करने वाला व्यक्ति था। पति के गुजरने के बाद अब गीता पर ही बच्चों के पालन का भी जिम्मा है।
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