झांसी। शराब के नशे की आदत को सिर्फ दो दिन में छूमंतर करने का दावा करने वाले अपने शिकार की तलाश में गली-गली घूमते रहते हैं। इनका सबसे अधिक कारगर हथियार इमोशनल ब्लैकमेल करना होता है। निशाना बनाने के लिए यह निम्न मध्यम वर्ग अथवा मध्यम वर्ग के लोगों को चुनते हैं।
शहर के साथ ही ग्रामीण इलाकों में भी सड़क किनारे तंबू लगा कर या किसी वाहन में लाउडस्पीकर लगाकर गली-गली शराब छुड़ाने की दवा खिलाने का दावा करने वाले घूमते रहते हैं। परिवार में किसी के शराब या नशे की गिरफ्त में होने की जानकारी मिलने पर सबसे पहले यह लोग घर की महिलाओं से संपर्क करते हैं। महिलाओं के साथ शर्तिया शराब छुड़ा देने का वायदा करके उनसे नकदी भी झटक लेते हैं। जानकार बताते हैं कि महिलाओं को हमेशा इस शर्त के साथ दवाई खिलाने को दी जाती है, कि वह मरीज को इसके बारे में कतई नहीं बताएंगी। यही सबसे अधिक घातक होता है। मरीज को खाने में मिलाकर खिला दिया जाता है लेकिन, उसे पता न होने से अगर उसने बड़ी मात्रा में शराब पी, जो वह उसके लिए जानलेवा तक हो जाती है।
जालसाजों को दवाई देने का कोई अनुपात भी पता नहीं होता। जादू-टोना की आड़ लेकर यह दवा बेंच देते हैं लेकिन, उसका अनुपात पता न होने से अक्सर वह घातक हो जाती है। गलत तरीके से दवाई खाने से मरीज को नुकसान तक उठाना पड़ता है। दवाई खाने के बाद सुनील की हालत भी इसी वजह से बिगड़ी। विशेषज्ञों का कहना है बिना चिकित्सकों की सलाह लिए कभी भी इस तरह की दवा नहीं खानी चाहिए।
जादू-टोना के फेर में बिखरा पूरा परिवार
जादू-टोना वालों की फेर में फंसकर सुनील को अपनी जान गंवानी पड़ गई जबकि उसका पूरा परिवार बिखर गया। परिवार में पत्नी हेमलता के अलावा पुत्री निकिता (12), कुणाल (10) एवं अभय (8) हैं। सुनील की कमाई पर ही पूरा परिवार आश्रित था। किसी तरह घर का खर्च चलता था लेकिन, सुनील की मौत के बाद परिवार के ऊपर जीवनयापन का संकट आ गया। सुनील की मौत के बाद परिजनों में कोहराम मच गया।
योग्य चिकित्सक की देख रेख में होना चाहिए इलाज
शराब छुड़ाने के लिए अकसर जिस दवा का इस्तेमाल होता है, उसे चिकित्सक बेहद खतरनाक बताते हैं। डॉक्टरों के मुताबिक इसका असावधानीपूर्वक इस्तेमाल अकसर जानलेवा हो जाता है। उनका कहना है मनोचिकित्सकों के अलावा शराब छुड़वाने के धंधे में शामिल जालसाज भी इसका इस्तेमाल करते हैं लेकिन, उनको इसके इस्तेमाल का तरीका नहीं पता होता। इसका खामियाजा दवाई खाने वाले को भुगतना पड़ता है। मनोचिकित्सक डॉ. अर्जित गौरव के मुताबिक जालसाज शराब पीने वाले के परिजनों को विश्वास में लेकर यह दवाई खिलाते हैं। परिजन भी नशा करने वालों को न बताकर चुपचाप उसे खाने में मिलाकर दवा खिला देते हैं। दवाई खाने के बाद अगर शराब पीने पर यह घातक असर दिखना शुरू करती है। बेचैनी के साथ ही दिल की धड़कन काफी तेज हो जाती है। अगर मरीज की निगरानी सही से नहीं हुई तब वह अपनी चेतना खो बैठता है। डॉक्टरों को भी इसका पता नहीं चलता। डॉ. गौरव का कहना है इस दवा का इस्तेमाल योग्य चिकित्सक की देखरेख में होना चाहिए।