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झांसी : सिंधिया राजवंश बाईसा की मदद करता तो आजादी इतनी मुश्किल न थी...

Wed, 29 Dec 2021 04:47 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, झांसी

सार

ज्योतिरादित्य सिंधिया की पहल की साहित्यकार और इतिहासकार कर रहे हैं सराहना।
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रानी लक्ष्मीबाई की समाधि पर उन्हें नमन करते ज्योतिरादित्य सिंधिया - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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डेढ़ शताब्दी बाद सिंधिया राजवंश का ग्वालियर में रानी लक्ष्मीबाई की समाधि पर पहुंचकर नमन करने को लेकर चर्चाओं का आलम है। साहित्यकार और इतिहासकारों ने इसे सकारात्मक कदम बताते हुए पुरानी भूलों का पश्चाताप कहा है। वहीं उन्होंने पुराने इतिहास को याद कर यह भी अफसोस जताया कि काश, सिंधिया राजवंश तब रानी की मदद कर देता, तो अंग्रेज कब का इस मुल्क को छोड़कर चले जाते और आजादी पाने के लिए इतने लंबे समय तक संघर्ष नहीं होता। 

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शनिवार को ज्योतिरादित्य सिंधिया ने ग्वालियर में रानी लक्ष्मीबाई की समाधि पर पहुंचकर उनकी शहादत को नमन किया था। सोमवार सुबह इसका वीडियो वायरल होने के बाद चर्चाओं का दौर शुरू हो गया। पहली बार सिंधिया राजवंश के किसी वंशज का रानी के समाधि स्थल पर पहुंचना एक आश्चर्य ही था। इसकी इतिहास और साहित्य से जुड़े लोगों ने सराहना की। मगर पुराने घटनाक्रम को लेकर फिर से बात शुरू हो गई है। हालांकि सभी ने पुरानी बातों को भूलकर आगे बढ़ने के संकल्प के साथ पहल का स्वागत किया।

तो तलवार भी झांसी में होती
इतिहासकार लोकभूषण पन्नालाल असर कहते हैं कि वर्ष 1857 में हुए स्वाधीनता संग्राम में बड़ी संख्या में बुंदेले हरबोलों ने भाग लिया था। रानी जब अंग्रेजों को मात देकर ग्वालियर पहुंचीं, तो सिंधिया घराने ने उनकी मदद नहीं की। इसके कुछ भी कारण हो सकते हैं। साहित्यकारों ने इस बात का स्पष्ट उल्लेख भी किया है। अगर सिंधिया से रानी लक्ष्मीबाई को थोड़ी सी भी मदद मिल जाती, तो शायद आज हालात कुछ और होते। देश तभी स्वतंत्र हो जाता और झांसी की भी तस्वीर कुछ और होती। शायद रानी की तलवार भी यहां होती। अब अगर ज्योतिरादित्य ने रानी की समाधि पर पहुंचकर उनको नमन किया है, तो इससे साफ है कि वह अपने पूर्वजों की भूल का पश्चाताप कर रहे हैं।  उनकी पहल सकारात्मक  है।
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सिंधिया ने रानी को लिखा था पत्र
इतिहासकार मुकुंद मेहरोत्रा बताते हैं कि सिंधिया ने मदद नहीं की, इसका कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है। लेकिन सिंधिया ने रानी की मदद करने से इनकार भी नहीं किया था। सिंधिया अंग्रेजों से पहले ही तीन बार हार चुके थे। इसके साथ ही उन्होंने कुछ समय पहले रानी को पत्र लिखा था कि उनके कुछ विश्वास पात्र लोग दगा दे सकते हैं। इस पत्र में सिंधिया ने यह भी लिखा था कि मैं आपकी मदद नहीं कर सकता, तो आपको रोकूंगा नहीं। रानी ने इस पत्र पर गौर नहीं किया। बाद यह पत्र अंग्रेजों तक पहुंच गया। पहले यह भी पत्र मेरे पास था, लेकिन अब नहीं है। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों ने सिंधिया को राजधानी ग्वालियर छोड़ने को मजबूर किया था। उनकी गलती बस ये थी कि रानी के बाद झांसी उनको दे दिया गया। हालांकि सिंधिया परिवार ने कभी रानी की विरोध नहीं किया। ज्योतिरादित्य की पहल से भी यही बात साफ हुई है।  

ज्योतिरादित्य की पहल हृदय परिवर्तन
बिपिन बिहारी डिग्री कॉलेज के पूर्व प्राचार्य प्रो. एमएम पांडेय कहते हैं कि ज्योतिरादित्य सिंधिया की पहल से साफ है कि उनका हृदय परिवर्तन हुआ है। अगर यही भाव उनके पूर्वजों ने दिखाया होता तो हिंदुस्तान की तस्वीर कुछ और ही होती। पूर्वजों के किए काम को अगर वंशज सुधारना चाहते हैं, तो यह अच्छी बात है। इस पहल के साथ ही देश में सनातनी एकत्रीकरण का जो अभियान चल रहा है, वह काफी अच्छा है। 

देर आए दुरुस्त आए
महाराष्ट्र गणेश मंदिर कमेटी के सचिव गजानन खानवलकर का कहना है कि बदलते हुए दौर में ज्योतिरादित्य सिंधिया का मन बदला है, तो यह अच्छी बात है। कह सकते हैं कि देर आए दुरुस्त आए। हां, उस वक्त रानी को ग्वालियर से मदद मिल जाती, तो शायद देश की स्थिति कुछ और होती। ज्योतिरादित्य सिंधिया के समाधि स्थल पर जाने का कारण कुछ भी रहा, तो लेकिन सार्वजनिक तौर पर उनकी यह पहल सकारात्मक है।

पहल से प्रेरणा लेने की जरूरत
वरिष्ठ पत्रकार मोहन नेपाली कहते हैं कि ये बात सही है कि अगर उस वक्त हमारी बाईसा को ग्वालियर से सहयोग मिलता, तो अंग्रेज कब का देश छोड़ चुके होते। मगर अब ज्योतिरादित्य ने बाईसा को प्रणाम किया है, तो यह पहल प्रेरणा देती है। इससे साफ है कि युवाओं में देशभक्ति की भावना जागृत हो रही है। यह पहल सकारात्मक है। 

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