झांसी। दुर्घटनाग्रस्त हुई इंदौर - राजेंद्र नगर एक्सप्रेस में तकनीकी खामी ट्रेन चालक जलज शर्मा ने पहले ही भांप ली थी और उन्होंने इसकी सूचना मंडल कंट्रोल को भी दे दी थी। बावजूद, गाड़ी आगे बढ़ा दी गई। यह सूचना सोमवार को दिन भर विभिन्न संचार माध्यमों पर तैरती रही। हालांकि, रेलवे के अधिकारी इस संबंध में अभी कुछ कहने को तैयार नहीं हैं, जबकि रेलवे के तकनीकी जानकारों का कहना है कि ऐसे हालात में ड्राइवर स्वयं ट्रेन को आगे नहीं ले जाने का निर्णय लेने में सक्षम होता है।
चर्चा है कि हादसे के बाद कानपुर पहुंचने पर ड्राइवर जलज शर्मा ने बयान दिया है। इस कथित बयान में उन्होंने रेल अधिकारियों को हादसे के लिए जिम्मेदार ठहराया है। ड्राइवर के कथित बयान के मुताबिक झांसी के बाद ही उन्हें खतरे के बारे में पता चल गया था, जिसके बारे में उन्होंने मंडल कंट्रोल को बताया था, मगर अधिकारी ने उनसे ट्रेन को कानपुर तक ले जाने को कहा। रात एक बजे झांसी से चलने के बाद दो स्टेशन पार होते ही उन्हें इंजन मीटर में अधिक लोड दिखा। उन्होंने लोको इंस्पेक्टर डीपी यादव व कंट्रोल को दुबारा स्थिति से अवगत कराया। कंट्रोल से कहा गया कि ट्रेन को जैसे-तैसे कानपुर ले जाओ फिर देखेंगे। झांसी डिवीजन के इस ड्राइवर ने कानपुर सेंट्रल स्टेशन की चालक लॉबी में दिए कथित बयान में बताया कि 3.03 बजे ओएचई में तेज धमाके के बाद उसने इमरजेंसी ब्रेक लगाए, जिससे ट्रेन हादसे का शिकार हुई।
हालांकि, अब यहां यह सवाल भी पैदा होता है कि जब ड्राइवर को ट्रेन जैसे - तैसे कानपुर तक पहुंचाने को कहा गया था, तो भी गाड़ी को 110 किमी प्रति घंटा रफ्तार से क्यों दौड़ाया गया, जबकि ट्रेन कम स्पीड में भी खींची जा सकती थी। इससे हादसे की संभावना न्यून रहती।
इसके अलावा यहां यह भी उल्लेखनीय है कि जहां रनिंग स्टाफ चेंज होता है, वहां आम तौर पर जांच के बाद ही ट्रेन को स्टेशन से आगे बढ़ाया जाता है। झांसी स्टेशन पर सभी गाड़ियों का रनिंग स्टाफ चेंज होता है। ड्राइवर ने अगर जांच के बाद तकनीकी खराबी को भांप लिया होता तो उन्होंने इसकी जानकारी कंट्रोल रूम को अवश्य दी होती। अगर, कंट्रोल अधिकारी इसके बाद भी उनको गाड़ी चलाने के लिए कहते तो वह अपने विवेक से गाड़ी रोकने का फैसला कर सकते थे। कंट्रोल रूम के सूत्रों के अनुसार ड्राइवर ने इस तरह की कोई जानकारी कंट्रोल रूम को नहीं दी।
ड्राइवर जलज शर्मा ने क्या बयान दिया है, इसकी कोई जानकारी नहीं है। हादसे की मुख्य संरक्षा आयुक्त की अध्यक्षता में जांच शुरू कर दी गई है। जांच के बाद ही सभी बिंदु सामने आएंगे। अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।
- मनोज कुमार सिंह, पीआरओ
हादसे के यह भी बताए गए कारण
घटनास्थल पर कुछ यात्रियों ने भी हादसे के अलग-अलग कारण बताए है। एक ने कहा कि चलती गाड़ी में उनको झटके लग रहे थे। दूसरे का कहना था कि रास्ते में जानवर कट गया था, जिससे गाड़ी 15 मिनट खड़ी रही। जानवर का मांस हौज पाइप में फंसने से आवाज आ रही थी। एक चैनल पर रनिंग स्टाफ के एक नेता द्वारा दिया बयान इंजीनियरिंग विभाग पर सवाल खड़ा कर रहा है। अपने बयान में उन्होेंने कहा कि पिछले तीन दिन से घटनास्थल के आसपास ड्राइवरों को लर्च (हल्के झटके) महसूस हो रहे थे, मगर इंजीनियरिंग विभाग ध्यान नहीं दे रहा था। इन सभी कारणों से रेल विशेषज्ञ संतुष्ट नजर नहीं आते हैं। उनका इन बयानों को लेकर अपना नजरिया अलग है।
विशेषज्ञों ने किया तर्कों को खारिज
- ड्राइवर के पास अधिकार रहता है कि वह खतरे की स्थिति में गाड़ी आगे न बढ़ाए। नजदीकी स्टेशन पर गाड़ी रोके कमी को दूर करें और स्टेशन मास्टर की ओके रिपोर्ट लेकर गाड़ी को आगे ले जाए।
- मालगाड़ी में ओएचई (ओवर हैड इलेक्ट्रिक) मीटर का लोड बढ़ता सकता है। मेल या अन्य सवारी गाड़ियों में लोड बढ़ने की स्थिति नहीं बनती।
- ड्राइवर ने अगर रेलवे कंट्रोल को खतरे से आगाह किया था तो वहां 72 घंटे की रिकार्डिंग रहती है। भरोसेमंद सूत्रों की माने तो ड्राइवर ने कंट्रोल को इस तरह का कोई मेसेज नहीं दिया।
- इंजन या बोगियों के नीचे कोई पार्ट लटक रहा है तो किसी भी क्रासिंग या स्टेशन से गुजरते समय वहां के स्टाफ को वो कमी अवश्य दिख जाएगी। ऐसे में स्टेशन स्टाफ वॉकी-टॉकी पर ड्राइवर को सूचित कर गाड़ी को आगे खड़ी करा लेता है। झांसी व पुखरायां के बीच पंद्रह स्टेशन व 40 क्रासिंग गेट बने हुए हैं।
- ट्रैक पर अगर लर्च (हल्के झटके) या जर्क (बड़े झटके) लगते हैं तो ट्रेन चालक नजदीकी स्टेशन पर इस बात की जानकारी अवश्य देते हैं। यह स्थिति पटरियों के नीचे गिट्टी या मिट्टी या अन्य कमी से उत्पन्न हो सकती है। जब तक वह कमी दूर नहीं होती, तब तक ड्राइवर उस सेक्शन से 10 से 15 किलोमीटर की रफ्तार से मौके से गुजरते हैं।
- इंदौर-पटना एक्सप्रेस की बोगियां को देखकर लगता है कि वह अपनी अवधि को पूरा करने के करीब है। ऐसे कोचों में चर-चर कर आवासी पार्ट्सों से आने लगती हैं, जिसे यात्री तकनीकी खराबी या झटके समझने लगते हैं।