झांसी। इलाज के नाम पर होने वाले कमीशनबाजी के खेल में बुधवार को एक मछली कारोबारी की जान चली गई। जहर खाने के बाद परिजन उसे मेडिकल कॉलेज लाने के लिए निकले, लेकिन एंबुलेंस चालक ने उसे एक निजी अस्पताल में दाखिल करा दिया, जिसका बिल भरने के लिए परिजनों को जमीन तक गिरवीं रखनी पड़ गई। हालत बिगड़ने पर मेडिकल भेज दिया, जहां उसकी मौत हो गई।
थाना टोड़ी फतेहपुर के ग्राम राजापुर निवासी बलवीर (28) मछली का कारोबार करता है। पिछले कुछ समय से उसका काम ठीक नहीं चल रहा था, जिससे वो मानसिक रूप से परेशान रहने लगा था। तीन जुलाई को घर के सभी लोग खेत पर गए हुए थे। वो घर में अकेला था। इसी दरम्यान उसने जहर खा लिया, जिससे उसकी हालत बिगड़ गई। परिवार के लोग पहले उसे लेकर गुरसराय के अस्पताल भागे, यहां से मेडिकल के लिए रेफर कर दिया गया। परिजन उसे एक निजी एंबुलेंस में लेकर मेडिकल के लिए निकले, लेकिन एंबुलेंस चालक ने गाड़ी एक निजी अस्पताल के बाहर खड़ी कर दी। एंबुलेंस चालक ने परिजनों को बताया कि मेडिकल में देखरेख ठीक नहीं होती है। निजी अस्पताल में इलाज कराने से युवक की जान बच जाएगी। परिजन चालक की बातों में आ गए और उन्होंने बलवीर को निजी अस्पताल में दाखिल कर दिया। यहां तीन दिन भर्ती रहा और हालत बिगड़ने पर मेडिकल में भेज दिया, जहां उसकी मौत हो गई।
बुधवार को पोस्टमार्टम हाउस के बाहर बैठे मृतक के बड़े भाई जितेंद्र प्रजापति ने बताया कि निजी अस्पताल में इलाज पर तीन लाख रुपये खर्च हो गए। पैसा जमा करने के लिए छह बीघा जमीन गांव के ही एक व्यक्ति के पास गिरवीं रखनी पड़ गई। पचास हजार रुपये यहां-वहां से जुटाए। बावजूद, भाई की जान नहीं बच पाई।
विदित हो कि कई निजी अस्पतालों में कमीशनबाजी का खेल हावी है। मरीज को अस्पताल लाने वाली एंबुलेंस व ऑटो चालकों को कमीशन दिया जाता है। यहां तक कि गांव से मरीजों को निजी अस्पताल में रेफर करने वाले कुछ चिकित्सकों को भी हिस्सा दिया जाता है। मेडिकल कॉलेज के इर्दगिर्द दलाल घूमते रहते हैं, जो मरीजों को अच्छे इलाज का प्रलोभन देकर निजी अस्पतालों में ले जाते हैं। इलाज पर आने वाले कुल खर्च में से उन्हें 20-25 तक कमीशन मिलता है।