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सीएमओ की ‘क्लास’ में महिला अस्पताल का स्टाफ हुआ ‘फेल’

Wed, 27 May 2015 01:53 AM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला
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झांसी। महिला अस्पताल के स्टाफ की कारगुजारियों से आजिज मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने मंगलवार को चिकित्सकों समेत सभी स्टाफ कर्मचारियों के साथ बैठक की। इस दौरान उन्होंने मरीज के भर्ती होने से लेकर प्रसव तक की पूरी प्रक्रिया के संबंध में जानकारी मांगी तो सभी के चेहरे की हवाइयां उड़ गईं। कोई भी पूरी प्रक्रिया नहीं बता पाया। इस पर सीएमओ नाराज हो गए, हालांकि बाद में उन्होंने पूरी प्रक्रिया समझाई।
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गौरतलब है कि सैंयर गेट निवासी राजा की पत्नी शबाना (24 वर्ष) को रविवार रात प्रसव पीड़ा होने पर जिला महिला अस्पताल जाया गया था। ड्यूटी पर रहीं महिला चिकित्सक ने उसे सुबह लाने की बात कहते हुए टरका दिया।  परिजन भी उल्टे पांव सुबह इलाज की उम्मीद लेकर घर चले गए। सोमवार की सुबह करीब नौ बजे प्रसूता को परिजन महिला अस्पताल लेकर पहुंचे, लेकिन तब तक प्रसूता की तबियत काफी बिगड़ चुकी थी। आरोप लगाया गया था कि सुबह ओपीडी में तैनात मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. वसुधा अग्रवाल ने मरीज को बिना भर्ती किए तीमारदार को एक यूनिट खून की व्यवस्था करने को कहा। तीमारदार मरीज को भर्ती करने का आग्रह करने लगे तो चिकित्सक ने जटिल प्रसव का बहाना बनाकर मेडिकल कालेज ले जाने की सलाह दी। कई घंटे से परेशान तीमारदारों ने मरीज को भर्ती न करने पर हंगामा शुरू कर दिया। बाद में सीएमओ के निर्देश पर मरीज को भर्ती किया गया था।

इसी मामले को लेकर  मंगलवार को सीएमओ विनोद यादव ने महिला अस्पताल के चिकित्सक व स्टाफ कर्मियों के साथ बैठक की। सीएमओ ने सभी से मरीज आने के बाद  इलाज/ प्रसव होने की पूरी प्रक्रिया पूछी, तो कोई भी संतोषजनक जवाब नहीं दे पाया। इस पर उन्होंने नाराजगी जताई। सीएमओ ने बताया कि यह बहुत गंभीर बात है कि किसी को भी पूरी प्रक्रिया की जानकारी नहीं है। शबाना मामले में जिसकी लापरवाही है, उसके खिलाफ कार्रवाई हेतु चार दिन में रिपोर्ट सीएमएस से मांगी गई है।
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व्यवस्था बदले या व्यवस्थापक
झांसी। महिला अस्पताल में मरीजों को घंटों भर्ती न करना, दुर्व्यवहार करना समेत कई शिकायतें समय-समय पर सामने आती रहती हैं। कई बार अस्पताल परिसर में ही प्रसूता बच्चे को जन्म दे देती है। मामला मीडिया में सुर्खियां बनता है, तो स्वास्थ्य अमला हरकत में आ जाता है। आनन-फानन में जांच कमेटी गठित कर दी जाती है। कुछ महीनों तक जांच होती है। तब तक मामला ठंडा हो जाता है और आरोपी को प्रतिकूल प्रविष्टि देकर या तबादला कर कार्रवाई की इतिश्री कर ली जाती है। लोगों के जेहन से मामला उतरने के कुछ समय बाद फिर कोई घटना होती है। उसमें भी यही प्रक्रिया दोहराई जाती है और फिर किसी निचले कर्मचारी पर हल्की कार्रवाई कर मामला खत्म कर दिया जाता है। इन सबके बीच कराहता आम आदमी ही है। महिला अस्पताल में बार-बार घटनाओं के बावजूद अस्पताल प्रशासन की चाल में कोई सुधार नहीं हो रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि व्यवस्था बदलना चाहिए या व्यवस्थापक।
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