- 1977 में ढह गया था कांग्रेस का किला, बीएलडी ने दर्ज की थी जीत
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अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। लोकसभा के पहले चुनाव में ही झांसी-ललितपुर संसदीय क्षेत्र कांग्रेस के मजबूत किले में तब्दील हो गया था। इसके बाद कांग्रेस ने इस सीट से एक के बाद एक लगातार पांच चुनावों में जीत दर्ज की थी। लेकिन, सन 1977 में हुए लोकसभा के छठवें चुनाव में देश भर में सियासी हवा बदल चुकी थी और इसकी सरसराहट यहां भी महसूस की जाने लगी थी। इसी चुनाव में जनसभा को संबोधित करने चौधरी चरण सिंह झांसी आए थे। तब उनकी सभा में हजारों की संख्या में लोगों की भीड़ जमा हुई थी। यहां तक कि किसान अपने कंधों पर हल रखकर उनकी सभा में शामिल हुए थे। इस चुनाव में कांग्रेस को पहली बार इस सीट से हार का सामना करना पड़ा था और जीत चौधरी चरण सिंह की पार्टी भारतीय लोक दल (बीएलडी) की प्रत्याशी के खाते में गई थी।
सन 1952 में हुए लोकसभा के पहले ही चुनाव में कांग्रेस ने झांसी-ललितपुर संसदीय क्षेत्र पर अपना कब्जा जमा लिया था। इसके बाद सन 1971 तक हुए अगले चार चुनावों में भी कांग्रेस की इस सीट को कोई भी विपक्षी दल भेद नहीं सका था। यहां से कांग्रेस को पहली बार 1977 में हार का सामना करना पड़ रहा था। तब पूरे देश में कांग्रेस के खिलाफ हवा चल रही थी। झांसी में भी इसका असर नजर आने लगा था। इसी बीच चौधरी चरण सिंह यहां जनसभा को संबोधित करने आए थे। उन्होंने अपनी पार्टी भारतीय लोकदल से इस सीट पर डा. सुशीला नैयर को प्रत्याशी बनाया था। नैयर के समर्थन में चरण सिंह की सभा किले के मैदान में आयोजित की गई थी। चरण सिंह सभा में तय समय से चार घंटे बाद पहुंचे थे। लेकिन, उनके पहुंचने से पहले ही मैदान खचाखच भर चुका था। आलम यह था कि लोग किले की पहाड़ी पर भी बैठे हुए थे। यह पहला मौका था जब किसी गैर कांग्रेसी नेता की सभा में इतने लोग इकट्ठा हुए थे। यहां तक कि ललितपुर से दो सौ किसान कंधे पर हल रखकर सभा में शामिल होने के लिए आए थे। ये किसान दो दिन पहले ललितपुर से चले थे और पैदल ही यहां पहुंचे थे। इसे देखकर चरण सिंह बेहद खुश हो गए थे, क्योंकि उनकी पार्टी का चुनाव चिह्न हलधर किसान ही था। चरण सिंह ने हल लेकर आए किसानों से मंच से उतरकर अलग से मुलाकात की थी। जनसभा में जमा हुई भीड़ को देखकर चरण सिंह गदगद थे और वे अपनी पार्टी के प्रत्याशी की जीत को लेकर आश्वस्त हो गए थे। इस सभा के बाद चुनाव की हवा ही एकदम बदल गई थी। चुनाव का नतीजा भारतीय लोकदल के पक्ष में गया था। पहली बार इस सीट से कांग्रेस को हार सामना करना पड़ा था।
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पुराने कांग्रेसियों ने भी फेर लिया था मुंह
इतिहासकार मुकुंद मेहरोत्रा ने बताया कि इमरजेंसी के बाद हुए लोकसभा के पहले चुनाव का नजारा ही कुछ और था। यह पहला मौका था जब कोई विपक्षी दल कांग्रेस पर हावी हुआ था। देश भर में इंदिरा गांधी के विरोध की लहर चल रही थी। उनकी नीतियों से खफा होकर कई कांग्रेसी अपनी पार्टी के विरोध में खड़े हो गए थे। इसी का नतीजा था कि चौधरी चरण सिंह के यहां आने पर उन्हें अपार जनसमर्थन हासिल हो गया था। इसके बाद जनता ने उनकी पार्टी के प्रत्याशी को धमाकेदार जीत का तोहफा दिया था।