पंजाब विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. जयप्रकाश ने कहा कि पुराण और इतिहास एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, बस इसे देखने की दृष्टियां अलग हैं। वामपंथी विचारधारा के अनास्थावादी लोग पुराणों के तथ्यों को काल्पनिक बताकर खारिज करते रहे हैं। आज वैज्ञानिक मानने लगे हैं कि पुराणों के तथ्य सत्य हैं। उन्होंने यह बात बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में आयोजित पुराख्यानिक कथा साहित्य का आधुनिक परिप्रेक्ष्य विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी में कही।
केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा, उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में हुई संगोष्ठी में उन्होंने कहा कि पुराख्यानिक कथाओं को खारिज कर देना एक फैशन हो सकता है लेकिन उचित नहीं है। कुलपति प्रो. सुरेंद्र दुबे ने कहा कि पुराख्यानों को कोई भी अपने जीवन से अलग नहीं कर सकता है। हर रचनाकार अपने समय के सवालों का उत्तर पात्रों के जरिए देने का प्रयास करता है। उन्होंने वाल्मीकि, तुलसीदास, मैथिलीशरण गुप्त के आदर्श पात्र राम की विशिष्टताओं का अंतर भी बताया। दिल्ली विश्वविद्यालय की की प्रो. नीलम राठी ने कहा कि पुराणों की कथाएं हमें जीवन में सही व्यवहार करने का तरीका सिखाती हैं। पुराख्यानों की शक्ति का उदाहरण देते हुए कहा कि जय संतोषी मां की कथा ने आम महिलाओं को भी सिनेमाघर तक पहुंचा दिया। हैदराबाद के केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रो. आलोक पांडेय ने बताया कि देश के तथाकथित बुद्धिजीवियों को पुराख्यानिक कथाएं बकवास लगती हैं, जबकि आमजन को यह प्रेरित करती रही हैं। यूपी भाषा संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष राजनारायण शुल्क ने कहा कि एक विचारधारा विशेष के लोगों ने भारतीय संस्कृति की विशेषताओं का ध्वंस किया लेकिन कम पढ़ी लिखी होने के बाद भी बहुसंख्य जनता ने उस विचारधारा को खारिज कर दिया। भोपाल के डॉ. राजेश श्रीवास्तव ने भी विचार रखे। डॉ. विनम्रसेन सिंह की पुस्तक का विमोचन हुआ। बाद में साहित्यकार से मिलिए कार्यक्रम में पुस्तक प्रेमियों को प्रख्यात साहित्यकार डॉ. मैत्रेयी पुष्पा, युवा कथाकार विवेक मिश्र और कहानीकार ब्रजमोहन से सीधा संवाद करने का मौका मिला। लोगों ने इन रचनाकारों से उनके जीवन के अनुभव सुने।
संचालन डा. पुनीत विसारिया ने किया।