झांसी। भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) ने 1 जुलाई 2024 को 162 साल पुरानी भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की जगह ली थी। आज इसके दो साल पूरे हो गए लेकिन, थानों के सामान्य कामकाज में आईपीसी की पुरानी धाराओं के सहारे ही बीएनएस की नईं धाराएं समझी जा रही हैं। नई धारा समझने में थानों के मुंशी और दरोगा गड़बड़ा जाते हैं। इस वजह से उनको आईपीसी का ही सहारा लेना पड़ता है।
162 साल तक देश में राज करने के बाद दो साल पहले आईपीसी की विदाई हो गई। इतने लंबे समय में इसकी तमाम धाराएं आम लोगों तक को रट गई थीं। धारा 420, 147, 376, 302, 307, 380 जैसी धाराएं अभी तक मुहावरों में इस्तेमाल होती हैं वहीं, पुलिस महकमे में थाना स्तर पर प्राथमिकी दर्ज करने वाले मुंशी समेत केस डायरी बनाने वाले दरोगाओं को भी आईपीसी की हर धारा बखूबी पता थी। दो साल पहले बीएनएस लागू होने के बाद यह सभी धाराएं बदल गईं लेकिन, थानों में पुरानी धाराओं का ही सिक्का है। हर थाने में मुंशी के सामने पुरानी धारा के चार्ट पेपर लगे हैं हालांकि मारपीट, गाली गलौज, हत्या, हत्या का प्रयास, दुष्कर्म जैसे मामले आने पर मुंशी नई धारा कुछ-कुछ पहचानने लगे हैं। जानकारों का कहना है कि बीएनएस में अपराध की प्रकृति के मुताबिक धाराएं अलग-अलग हैं। इस वजह से अभी भी सटीक धारा पहचानने में परेशानी होती है। केस डायरी तैयार करते समय दरोगा भी सक्षम नहीं हुए। एसएसपी बीबी जीटीएस मूर्ति का कहना है कि नए कानून के बारे में पुलिसकर्मियों को बकायदा प्रशिक्षित किया गया है। उनके लिए समय-समय पर प्रशिक्षण कार्यक्रम भी कराए जाते हैं।
यह हुए कानून में बदलाव
1 जुलाई 2024 से बीएनएस लागू होने के बाद आईपीसी की सभी 511 धाराएं बदल गईं। उनकी जगह बीएनएस में महज 358 धाराएं शामिल हुई। धाराओं का क्रम भी बदल गया। इसी तरह सीआरपीसी दंड प्रक्रिया संहिता अब भारतीय नागरिक न्याय सुरक्षा संहिता बन गई। सीआरपीसी में 484 धाराएं थीं जबकि नए कानून मेें 531 धाराएं हैं। भारतीय साक्ष्य अधिनियम-1872 अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम-2023 के नाम से पहचानी जाती है। पुराने अधिनियम में 167 प्रावधान थे। उनकी जगह 170 प्रावधान हैं।
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अभी बनी हुई है यह परेशानी
तकनीकी और बुनियादी ढांचे की कमी: थानों में तकनीकी उपकरणों और डिजिटल उपकरणों का अभाव है। नए नियमों के अनुसार हर साक्ष्य की वीडियोग्राफी अनिवार्य है, जिसका खर्च कई बार पुलिसकर्मियों को स्वयं उठाना पड़ता है। डिजिटल साक्ष्य भी नहीं बन पाते।
ई-एफआईआर प्रक्रिया में देरी: बिना थाने गए इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यमों से रिपोर्ट दर्ज करने की सुविधा तो है, लेकिन कानूनन उस शिकायत पर आगे की कार्रवाई तब तक नहीं होती, जब तक 3 दिन के भीतर शिकायतकर्ता थाने जाकर हस्ताक्षर न कर दे
शुरुआती जांच का प्रावधान: बीएनएस की धारा 173(3) के तहत पुलिस को 7 साल तक की सजा वाले मामलों में सीधे एफआईआर दर्ज करने के बजाय 14 दिन तक की प्रारंभिक जांच करने का अधिकार मिल गया है। इस नियम का फायदा उठाकर पुलिस तुरंत मुकदमा दर्ज करने से बचती है।