रेलवे आवासों में रहने वाले कई कर्मचारियों के परिजनों का छोटी- छोटी दिक्कतों के कारण सुकून छीना हुआ है। दिक्कत इतनी कि वे आवास पर ताला लगाकर जाने से भी डरते हैं। गोपनीय तरीके से कर्मचारी शिकायत भी कर चुके है, लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है।
पश्चिमी रेलवे कॉलोनी में वर्कशाप की तरफ जाने वाले रास्ते में प्रेमनगर की तरफ मुड़ने वाला तिराहा पड़ता है। इस तिराहे के आसपास बने सरकारी आवासों (बंगलों की तरह फैले) में कर्मचारी व उनके परिजनों का रहना दूभर बना हुआ है। तिराहे के आसपास पेड़ के नीचे दिन भर अराजक तत्वों का जमावड़ा रहता है, जिनका आपस में भद्दी- भद्दी गाली देकर आपस में लड़ना झगड़ना बना रहता है। यह शोर आवासों के अंदर तक पहुंचता है, जिससे परिजन परेशान रहते हैं। दूसरा, दर्जनों की संख्या में क्षेत्र में सुअर घूमते रहते हैं, जो किसी भी आवास के परिसर में झाड़ियों व तारों की चारदीवारी के बीच से घुस जाते है।
इससे रेल कर्मचारियों के छोटे बच्चे घर के बाहर तक नहीं खेल पाते हैं। ऐसी ही छोटी- छोटी कई समस्याओं ने रेल कर्मचारियों के परिवारों का चैन छीन रखा है। कर्मचारी संबंधित अधिकारी तथा पुलिस तक से शिकायत कर चुके हैं, लेकिन इन समस्याओं से उनको कोई निदान अब तक नहीं दिला सका है। यहां रहने वाली महिलाओं का कहना है कि उनके पति रात ड्यूटी से लौटकर आते है तो वह चैन से सो भी नहीं पाते है। इससे अशांति बनी रहती है।
‘अगर इस तरह की समस्या है तो मैं संबंधित अधिकारियों को अवगत करवाऊंगा, ताकि कर्मचारी सुकून से अपने आवास में रह सके।’
मनोज कुमार सिंह, पीआरओ रेलवे।
आउट हाउसों में झगड़ेलू परिवार
हर आवास के पीछे एक आउट हाउस बना होता है, जिसमें कर्मचारी अपने काम के लिए किसी को भी रख सकता है। अधिकांश आउट हाउसों में गरीब परिवारों ने कब्जे जमा रखे हैं। यहां रहने वाली एक होमगार्ड सिपाही ने तो पूरी कॉलोनी को परेशान कर रखा है। पर डर के मारे कोई खुलकर नहीं बोलता।