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ऐसी क्रिकेट टीम जिसमें खेल रहे आठ सगे भाई, अब नीली जर्सी और आईपीएल पर निगाहें

Wed, 08 Jan 2020 02:03 AM IST
झांसी ब्यूरो अमर उजाला ब्यूरो, झांसी
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आठ सगे भाईयों वाली क्रिकेट टीम - फोटो : अमर उजाला
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क्या आपने कभी ऐसी क्रिकेट टीम के बारे में देखा, सुना या पढ़ा है, जिसमें आठ भाई, एक मामा और दो रिश्तेदार हों। बेशक आपका जवाब न होगा। अगर आपको ये अनूठी टीम देखनी है तो इसके लिए झांसी के दातार नगर परवई गांव आना होगा। यहां पूरी टीम ही कुटुंब से बन गई है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों में बड़ी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेकर खिताब जीत चुकी टीम के खिलाड़ियों की चाहत अब नीली जर्सी और आईपीएल में खेलने की है। इसके लिए वे कड़ी मेहनत कर रहे हैं।

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संसाधनों की कमी का शिकार दातार नगर परवई गांव में क्रिकेट की शुरूआत सन 2000 में हुई थी। गांव के ही कुछ लोगों ने बिना ग्रिप वाला लकड़ी का बल्ला बनाकर खेलना शुरू कर दिया था। जैसे-जैसे समय बीतता गया, गांव के युवाओं का रुझान इस खेल के प्रति बढ़ता गया। सन् 2010 में गांव के युवाओं ने दातार क्लब नाम से अपनी टीम का गठन किया। टीम की खास बात यह थी कि सभी सदस्य एक ही परिवार के थे। इसमें रूपेश, जितेंद्र, रिंकू, अंकेश, नरेंद्र, अभिषेक, रंजीत, सोनू सगे भाई हैं। जबकि, धर्मेंद्र कबूतरा मामा और प्रदीप, जीतू कबूतरा परिवार के सदस्य हैं। यह टीम ग्वालियर, ललितपुर, सागर, चित्रकूट, गुना, भोपाल समेत कई शहरों में प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेकर खिताब जीत चुकी है। पिछले साल झांसी में हुई वृंदावन लाल क्रिकेट लीग भी इसी टीम ने जीती थी।

न ग्रिप वाला बल्ला जानते थे, न लेदर बॉल

गांव के पिछड़ेपन का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2011 तक दातार क्लब टीम के खिलाड़ी न तो ग्रिप वाला बल्ला जानते थे और न ही लेदर बॉल। टीम के सदस्य धर्मेंद्र बताते हैं कि पहली बार खिलाड़ियों के अच्छे प्रदर्शन की चर्चाएं सुनकर जब उन्हें झांसी की कई क्रिकेट प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के लिए बुलाया जाने लगा तो पहली बार 2011 में उन्होंने लेदर बॉल, ग्रिप वाला बल्ला, नेट आदि देखी।

रूपेश कप्तान, जीतू विकेटकीपर

दातार क्लब की टीम में काफी संतुलन है। सभी खिलाड़ियों की भूमिका तय है। टीम के सबसे छोटे सदस्य 15 वर्षीय जीतू विकेटकीपर हैं। जबकि, सबसे बड़े सदस्य 35 वर्षीय नरेंद्र समेत छह ऑलराउंडर हैं। इसके अलावा रूपेश कप्तान व प्रदीप उप कप्तान हैं।

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गांव में नहीं खेल मैदान, खेत में करते प्रैक्टिस

गांव में खिलाड़ियों के खेलने के लिए कोई मैदान नहीं है। मजबूरी में खिलाड़ियों को खेत में प्रैक्टिस करनी पड़ती है। प्रधान, गांव के लिए लोगों आदि की आर्थिक मदद से गांव में ही नेट लगवा लिया गया है। क्रिकेट के अलावा ये युवा खेती करते हैं। ऐसे में पारिवारिक लोग शुरूआत में क्रिकेट खेलने पर युवाओं को डांटते रहे लेकिन जब टीम व खिलाड़ियों का नाम होने लगा तो अब सपोर्ट करते हैं।

अंडर-15 के प्रथम चरण में हो चुका चयन

कानपुर में वर्ष 2011-12 में हुए अंडर-15 के प्रथम चरण के ट्रायल में रूपेश का चयन हो गया था। इससे गांव और टीम के सदस्यों में उम्मीद की लहर दौड़ उठी थी। हालांकि, द्वितीय राउंड में वह क्वालिफाई नहीं हो पाए। हालांकि, इससे युवाओं ने हार नहीं मानी। अब भी बड़े ख्वाब लेकर जी जान से प्रैक्टिस करने में जुटे हुए हैं।
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