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सब कुछ कुर्बान करने का जज्बा पैदा करती है कुर्बानी

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झांसी। अल्लाह ने अपने नबी हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के बेटे हजरत इस्माइल को कुर्बानी का हुक्म दिया था। इस तरह से अल्लाह ने उनका इम्तहान लिया था। वह खुशी-खुशी अल्लाह के हुक्म की तालीम करने के लिए राजी हो गए थे। इस तरह से वह अपने इम्तहान में कामयाब हो गए। इस पर अल्लाह ने उनको दुंबा (भेड़) की कुर्बानी करने का हुक्म दिया। इसी के बाद से यह अमल चलता आ रहा है। उलमा का कहना है कि अल्लाह के पास जानवर का न तो खून पहुंचता है और न ही गोश्त। अल्लाह तो अपने बंदे का जज्बा देखता है। इस तरह से कुर्बानी अल्लाह की राह में सब कुछ कुर्बान करने का जज्बा पैदा करती है।
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जमीयतुल उलमा-ए-हिंद के सदर मौलाना आमिल कासमी ने बताया कि हजरत इब्राहीम को अल्लाह ने कुर्बानी का हुक्म दिया तो सौ ऊंटों को अल्लाह की राह में कुर्बान किया था। अल्लाह ने फिर ख्वाब दिखाया कि कुर्बानी करो तो उन्होंने फिर सौ ऊंट कुर्बान कर दिए लेकिन अल्लाह ने कहा कि अपनी जान से भी अजीज की कुर्बानी करो। वह बेटे को कुर्बान करने के लिए पहाड़ी पर ले गए। इस पर अल्लाह ने हुक्म दिया कि जानवर की कुर्बानी करो। इस तरह से अल्लाह ने अपने नबी का इम्तहान लिया था। इसी तरह से अल्लाह अपने बंदों को दौलत देकर भी इम्तहान लेता है। अगर वह अल्लाह की राह में अपनी दौलत खर्च करते हैं तो उनकी दौलत बढ़ती है लेकिन दौलत मिलने के बाद भी गरीबों पर खर्च नहीं करते तो उनकी दौलत घटती है। इसीलिए कुरान में भी अल्लाह ने बार-बार नमाज के बाद जकात का जिक्र किया है। यह कुर्बानी मालदारों की दौलत की हिफाजत भी करती है। जो लोग भी साहिबे निसाब यानी मालदार हैं उन पर कुर्बानी कराना फर्ज है। अगर वह कुर्बानी नहीं कराते तो गुनहगार होंगे।
मुफ्ती इमरान नदवी ने कहा कि कुर्बानी से भी गरीब तबके की मदद होती है। जो लोग कुर्बानी के जानवर पालते हैं उनको अच्छे पैसे मिलते हैं। कुर्बानी की खाल भी गरीबों और मिस्कीनों के काम में दी जाती है। उसका पैसा उनके काम आता है। इसके अलावा जानवर का गोश्त भी गरीबों को दिया जाता है। इसलिए कुर्बानी सिर्फ जानवर को काटने का नाम नहीं है। अल्लाह को कंजूस लोग पसंद नहीं हैं। सहाबी तो अपने पास खर्च के लिए पैसे रखकर सब कुछ गरीबों को दे दिया करते थे। इसलिए बंदे अल्लाह की राह में खर्च करने वाले बनें।
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