झांसी। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में किए गए हालिया शोध के मुताबिक कान के निशान भी अपराध की जांच और अपराधियों की पहचान में भरोसेमंद बायोमीट्रिक तरीका बन सकते हैं। शोध में बताया गया है कि कान की बनावट, उभार और घुमाव हरेक व्यक्ति में अनूठे होते हैं। आधार कार्ड की तरह यदि सही तरीके से इसे डिजिटल स्वरूप में लाया जाए या दस्तावेज रखे जाएं तो वे अपराधियों की पहचान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
डेढ़ साल तक चला शोध
शोधकर्ताओं का कहना है कि इस पद्धति पर किए गए शोध में 342 लोगों को शामिल किया गया। डेढ़ साल तक किए गए शोध के बाद अब यह निष्कर्ष सामने आया है। यदि यह पद्धति सफल हो जाती है तो कान-निशान भी उंगलियों की छाप, चेहरे की पहचान और आंख की पुतली जैसे पारंपरिक बायोमीट्रिक तरीकों का पूरक साधन बन सकते हैं।
फिंगर प्रिंट व आंखों की तरह कान की भी यूनिक आईडी
डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम इंस्टीट्यूट ऑफ फोरेंसिक साइंस एंड क्रिमिनोलॉजी विभाग के समन्वयक डॉ. विजय यादव के नेतृत्व में डॉ. मुरली मनोहर यादव, डॉ. आकाश कुमार, डॉ. अभिमन्यु, हरसे व निधि भारद्वाज ने संयुक्त रूप से शोध किया है। डॉ. मुरली ने बताया जिस तरह से फिंगर प्रिंट व आंखें यूनिक आईडी होते हैं, उसी तरह से कान भी यूनिक आईडी हैं। देश में अभी तक कान की यूनिक आईडी का चलन नहीं है। जिस तरह हरेक के फिंगर प्रिंट अलग-अलग होते हैं, उसी तरह से कान भी भिन्न-भिन्न होते हैं। इसको वैज्ञानिक साक्ष्य के आधार पर अपराधियों के खिलाफ प्रयोग करने के लिए ही शोध किया है। उन्होंने बताया शोध में शामिल किए 342 लोगों के कान के ऊपरी हिस्से (ओरिकल पैटर्न) को चेक किया तो सभी एक-दूसरे से भिन्न मिले। आकार व आकृति भी अलग-अलग मिली। जब कानों की सांख्यिकी जांच की गई, तो पता चला कि एक इंसान के दोनों कानों में भी भिन्नता है।
वह बताते हैं कि अक्सर शातिर अपराधी चोरी, डकैती अथवा एटीएम तोड़ने की वारदात के समय ग्लब्स पहने रहते हैं। मुंह छिपाने के लिए मास्क या साफी बंधते हैं। पुलिस सीडीआर (कॉल डिटेल रिपोर्ट), मोबाइल टावर अथवा लोकेशन के आधार पर पकड़ भी लेती हैं मगर अक्सर संदेह का लाभ मिलने पर बरी हो जाते हैं। वह बताते हैं कि अक्सर वारदात को अंजाम देते समय अपराधी के कान खुले रहते हैं। ऐसे में सीसीटीवी कैमरे में कैद कानों की फोरेंसिक जांच के बाद पुलिस अपराधी को न सिर्फ गिरफ्तार कर सकेगी बल्कि सजा भी दिलवा सकेगी।